पढ़िए› दफ़्तर 5› एक मुरीद शेख की सेवा में आया — और मुझे इस बूढ़े शेख की उम्र नहीं चाहिए, बल्कि अक्ल और मारिफत का शेख चाहिए, भले ही वह ईसा (उन पर सलाम) पालने में हों और याह्या (उन पर सलाम) बच्चों के मकतब में हों। एक मुरीद ने शेख को रोते हुए देखा, तो वह भी उसके साथ रोने लगा। जब वह फारिग हुआ और बाहर आया, तो एक दूसरा मुरीद, जो शेख की हालत से ज़्यादा वाकिफ था, गैरत में उसके पीछे तेज़ी से बाहर आया और उससे कहा, 'ऐ मेरे भाई, मैं तुमसे कह चुका हूँ, अल्लाह अल्लाह! कहीं तुम यह न सोचो और न कहो कि शेख रो रहा था और मैं भी रो रहा था।' क्योंकि तीस साल तक बेरियाज़ रियाज़त करनी पड़ती है और उन खतरनाक वादियों और व्हेल से भरे समंदरों और शेरों और चीतों से भरे ऊँचे पहाड़ों से गुज़रना पड़ता है ताकि तुम शेख के उस रोने तक पहुँचो या न पहुँचो। अगर पहुँच गए तो 'ज़ुव्वियत ली अल-अर्ध' का शुक्राना अदा करोगे।› शेर 1327
M5:1327 — اژدها گردد شکافد بحر را / چون عصا حم از داد خدا
M5:1327
अर्थ · به زبانِ تو — आपकी भाषा · AI
Discussion — Ask about this beyt — answered from the Masnavi, every verse cited
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