مثنوی
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शेर के नीचे
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अर्थ
काँच
रीसेट
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दफ़्तर 5 ›
अनुभाग 117
بخش ۱۱۷ - گریان شدن امیر از نصیحت شیخ و عکس صدق او و ایثار کردن مخزن بعد از آن گستاخی و استعصام شیخ و قبول ناکردن و گفتن کی من بیاشارت نیارم تصرفی کردن
शेख की नसीहत और उसकी सच्चाई के असर से अमीर का रोना, और फिर उस बेबाकी के बाद ख़ज़ाना कुर्बान करना, और शेख का मना करना और क़बूल न करना, और यह कहना कि "मैं बग़ैर इशारे के कोई تصرف नहीं कर सकता।"
मूल
हिन्दी
दोनों
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M5:2769
این بگفت و گریه در شد های های اشک غلطان بر رخ او جای جای
M5:2770
صدق او هم بر ضمیر میر زد عشق هر دم طرفه دیگی میپزد
M5:2771
صدق عاشق بر جمادی میتند چه عجب گر بر دل دانا زند
M5:2772
صدق موسی بر عصا و کوه زد بلک بر دریای پر اشکوه زد
M5:2773
صدق احمد بر جمال ماه زد بلک بر خورشید رخشان راه زد
M5:2774
رو برو آورده هر دو در نفیر گشته گریان هم امیر و هم فقیر
M5:2775
ساعتی بسیار چون بگریستند گفت میر او را که خیز ای ارجمند
M5:2776
هر چه خواهی از خزانه برگزین گرچه استحقاق داری صد چنین
M5:2777
خانه آن تست هر چت میل هست بر گزین خود هر دو عالم اندکست
M5:2778
گفت دستوری ندادندم چنین که به دست خويش چيزي برگزين
M5:2779
این بهانه کرد و مهره در ربود مانع آن بد کان عطا صادق نبود
M5:2780
نه که صادق بود و پاک از غل و خشم شیخ را هر صدق مینامد به چشم
M5:2781
گفت فرمانم چنین دادست اله که گدایانه برو نانی بخواه
पिछला بخش ۱۱۶ - رفتن این شیخ در خانهٔ امیری بهر کدیه روزی چهار بار به زنبیل به اشارت غیب و عتاب کردن امیر او را بدان وقاحت و عذر گفتن او امیر را इस शेख का अमीरों के घर में दिन में चार बार ग़ैबी इशारे से टोकरी लेकर भीख मांगने जाना, और अमीर का उसे उसकी बेबाकी के लिए डाँटना, और उसका अमीर को माफ़ करना।
अगला بخش ۱۱۸ - اشارت آمدن از غیب به شیخ کی این دو سال به فرمان ما بستدی و بدادی بعد ازین بده و مستان دست در زیر حصیر میکن کی آن را چون انبان بوهریره کردیم در حق تو هر چه خواهی بیابی تا یقین شود عالمیان را کی ورای این عالمیست کی خاک به کف گیری زر شود مرده درو آید زنده شود نحس اکبر در وی آید سعد اکبر شود کفر درو آید ایمان گردد زهر درو آید تریاق شود نه داخل این عالمست و نه خارج این عالم نه تحت و نه فوق نه متصل نه منفصل بیچون و بی چگونه هر دم ازو هزاران اثر و نمونه ظاهر میشود چنانک صنعت دست با صورت دست و غمزهٔ چشم با صورت چشم و فصاحت زبان با صورت زبان نه داخلست و نه خارج او نه متصل و نه منفصل والعاقل تکفیه الاشارة ग़ैब से शेख को इशारा आया कि "यह दो साल तुमने हमारे हुक्म से लिया और दिया। अब से तुम दो और मत लो। अपनी चादर के नीचे हाथ डालो, क्योंकि हमने उसे तुम्हारे हक़ में अबू हुरैरा की थैली जैसा बना दिया है। जो चाहोगे, पाओगे, ताकि दुनिया वाले यक़ीन कर लें कि एक ऐसी दुनिया भी है जहाँ मिट्टी हाथ में लेने से सोना बन जाती है, मुर्दा उसमें आए तो ज़िंदा हो जाता है, सबसे बड़ा अशुभ उसमें आए तो सबसे बड़ा शुभ हो जाता है, कुफ़्र उसमें आए तो ईमान बन जाता है, ज़हर उसमें आए तो ज़हर मार बन जाता है। न यह इस दुनिया में दाख़िल है और न ही इस दुनिया से ख़ारिज, न नीचे है और न ऊपर, न मुत्तसिल है और न मुनफ़सिल, बे-चून-ओ-चिरा। हर पल उससे हज़ारों असर और नमूने ज़ाहिर होते हैं, जैसे हाथ की कारीगरी हाथ की सूरत से, आँख की ग़मज़ा आँख की सूरत से, और ज़बान की फ़साहत ज़बान की सूरत से न दाख़िल है और न ख़ारिज, न मुत्तसिल है और न मुनफ़सिल। और अक़लमंद के लिए इशारा ही काफ़ी है।"