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दीवान-ए-शम्स · غزل شمارهٔ ۱۵۸۶

  1. خویش را چون خار دیدم سوی گل بگریختم خویش را چون سرکه دیدم در شکر آمیختم

G1586:1

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इस शेर की व्याख्या

यह शे'र आत्मा के रूपांतरण की एक शक्तिशाली तस्वीर पेश करता है। रूमी दो समानांतर छवियों का उपयोग करते हैं: कांटा और गुलाब, और सिरका और चीनी। पहले मिसरे में, शायर कहता है, "जब मैंने ख़ुद को कांटे की तरह देखा, तो मैं गुलाब की ओर भागा।" यहाँ 'कांटा' (خار) अधूरे, दर्द भरे और अलग-थलग 'स्व' (नफ़्स) का प्रतीक है, जबकि 'गुलाब' (گل) दिव्य सौंदर्य, प्रेम और प्रियतम (ईश्वर) का प्रतीक है। यह भागना एक साधारण हरकत नहीं, बल्कि अपनी पीड़ादायक स्थिति से एक हताश पलायन है, सौंदर्य और मिलन की तलाश में। यह एक आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है, जो आत्म-जागरूकता से शुरू होती है कि मैं अपूर्ण हूँ।

दूसरा मिसरा इस विचार को और गहरा करता है: "जब मैंने ख़ुद को सिरके की तरह देखा, तो मैंने ख़ुद को चीनी में मिला दिया।" 'सिरका' (سرکه) आत्मा की कड़वाहट, खट्टेपन और नकारात्मक गुणों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि 'चीनी' (شکر) दिव्य मिठास, कृपा और प्रियतम के अस्तित्व का प्रतीक है। यहाँ क्रिया 'भागने' से 'मिल जाने' (آمیختم) में बदल जाती है, जो एक गहरे परिवर्तन का संकेत देती है। यह केवल प्रियतम के पास पहुँचना नहीं है, बल्कि अपने खट्टेपन को उनकी मिठास में पूरी तरह से घोल देना है, फ़ना हो जाना है। यह शे'र आने वाले अश'आर (जैसे बेत 2 में ज़हर से अमृत की ओर जाना) के लिए मंच तैयार करता है, जो सभी एक ही विषय को दर्शाते हैं: अपनी कमियों को पहचानकर, व्यक्ति दिव्य पूर्णता में शरण लेता है और रूपांतरित हो जाता है।

خارकांटाگلगुलाब, फूलبگریختمमैं भागाسرکهसिरकाشکرचीनी, शक्करآمیختمमैंने मिला दिया, मैं घुल-मिल गया

पूरी ग़ज़ल ↗

  1. 1 خویش را چون خار دیدم سوی گل بگریختم·خویش را چون سرکه دیدم در شکر آمیختم
  2. 2 کاسه پرزهر بودم سوی تریاق آمدم·ساغری دردی بدم در آب حیوان ریختم
  3. 3 دیده پردرد بودم دست در عیسی زدم·خام دیدم خویش را در پخته‌ای آویختم
  4. 4 خاک کوی عشق را من سرمه جان یافتم·شعر گشتم در لطافت سرمه را می بیختم
  5. 5 عشق گوید راست می گویی ولی از خود مبین·من چو بادم تو چو آتش من تو را انگیختم

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