दीवान-ए-शम्स› ग़ज़ल 2875› शेर 4 ← पिछला
दीवान-ए-शम्स · غزل شمارهٔ ۲۸۷۵
- گرچه چون شیر و شکر با همه آمیختهای هیچ عقلی نپذیرد ز تو که زین نفری
G2875:4
आपकी भाषा
आपकी भाषा में अभी तक कोई अर्थ नहीं — यह पूरी ग़ज़ल के लिए एक साथ बनता है:
ai-draft · gemini-2.5-pro
इस शेर की व्याख्या
अभी तक नहीं लिखी गई — इस ग़ज़ल के भीतर इस शेर का गहरा पाठ:
पूरी ग़ज़ल ↗
ganjoor: sh2875 · public domain