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दीवान-ए-शम्स · غزل شمارهٔ ۱
- خامُش که بَس مُستَعجِلَم، رَفتم سویِ پایِ عَلَم کاغذ بِنِه بِشکن قَلَم، ساقی دَرآمد الصَلا
G1:10
आपकी भाषा
चुप हो जा, कि मैं बहुत जल्दी में हूँ, मैं ध्वजा के चरणों की ओर चला,काग़ज़ रख दे, क़लम तोड़ दे, साक़ी आ गया है, बुलावा है।
अब चुप हो जाओ, क्योंकि मैं बहुत बेचैन हूँ और मैं प्रियतम के ध्वज के नीचे जा रहा हूँ; अब लिखने-पढ़ने का समय नहीं है, काग़ज़ और क़लम को छोड़ दो, क्योंकि साक़ी (दिव्य प्रेम पिलाने वाला) आ गया है और सबको बुला रहा है।
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इस शेर की व्याख्या
अभी तक नहीं लिखी गई — इस ग़ज़ल के भीतर इस शेर का गहरा पाठ:
مُستَعجِلजल्दी में, उतावलाپایِ عَلَمध्वजा का चरण, झंडे के नीचेالصَلا(अरबी) बुलावा, आमंत्रण
पूरी ग़ज़ल ↗
- 1 اِی رَستخیزِ ناگهان وی رحمتِ بیمُنتها·اِی آتشی اَفروخته، در بیشهٔ اَندیشهها
- 2 امروز خَندان آمدی، مِفتاحِ زندان آمدی·بر مُستمندان آمدی، چون بَخشش و فَضلِ خدا
- 3 خورشید را حاجِب تویی، اومید را واجِب تویی·مطلب تویی طالب تویی، هم مُنتها هم مُبتدا
- 4 در سینهها برخاسته، اندیشه را آراسته·هَم خویش حاجَت خواسته، هَم خویشتن کَرده رَوا
- 5 اِی روحبخشِ بیبَدَل، وِی لَذّتِ علم و عمل·باقی بهانهست و دَغَل، کاین علّت آمد وان دَوا
- 6 ما زان دَغَل کَژبین شده، با بیگُنه در کین شده·گَه مَستِ حورَالعین شده، گَه مستِ نان و شوربا
- 7 این سُکر بین هِل عَقل را، وین نُقل بین هِل نَقل را·کَز بهرِ نان و بَقل را، چندین نشاید ماجرا
- 8 تَدبیرِ صَد رَنگ اَفکنی، بَر روم و بَر زَنگ اَفکنی·وَ اندر میان جَنگ اَفکنی، «فی اِصطِناعٍ لا یُری»
- 9 میمال پنهان گوشِ جان، مینِه بَهانه بَر کَسان·جان «رَبِّ خَلِّصنی» زَنان، والله که لاغ است ای کیا
- 10 خامُش که بَس مُستَعجِلَم، رَفتم سویِ پایِ عَلَم·کاغذ بِنِه بِشکن قَلَم، ساقی دَرآمد الصَلا
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