दीवान-ए-शम्स› ग़ज़ल 1› शेर 3 ← पिछला · अगला →

दीवान-ए-शम्स · غزل شمارهٔ ۱

  1. خورشید را حاجِب تویی، اومید را واجِب تویی مطلب تویی طالب تویی، هم مُنتها هم مُبتدا

G1:3

आपकी भाषा

सूरज के द्वारपाल तुम हो, आशा के लिए अनिवार्य तुम हो,गंतव्य तुम हो, साधक तुम हो, अंत भी तुम हो, आरंभ भी तुम हो।
तुम ही सूरज को रास्ता दिखाने वाले हो और हर उम्मीद का आधार हो; तुम ही मंज़िल हो और तुम ही उसे खोजने वाले हो, तुम ही हर चीज़ की शुरुआत और अंत हो।

ai-draft · gemini-2.5-pro

इस शेर की व्याख्या

यह शे'र (beyt 3) ग़ज़ल के पहले दो शे'रों में स्थापित दिव्य प्रियतम के स्तवन को एक ब्रह्मांडीय और आध्यात्मिक स्तर पर ले जाता है। रूमी यहाँ विरोधाभासों को एक साथ लाकर प्रियतम की सर्वव्यापकता का वर्णन कर रहे हैं। पहली पंक्ति कहती है कि आप ही सूरज के 'हाजिब' (द्वारपाल) हैं, यानी भौतिक दुनिया का सबसे शक्तिशाली प्रकाश स्रोत भी आपके नियंत्रण में है, आपके आदेश पर ही वह प्रकट होता है। आप ही आशा को 'वाजिब' (अनिवार्य) बनाते हैं; आपके बिना आशा का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह विचार दूसरे शे'र (beyt 2) की छवि को आगे बढ़ाता है, जहाँ प्रियतम को 'कैदखाने की चाबी' और 'ख़ुदा की बख़्शिश' कहा गया है।

दूसरी पंक्ति इस विरोधाभास को और गहरा करती है: "गंतव्य (मतलब) भी तुम हो, और साधक (तालिब) भी तुम हो।" यह सूफ़ी विचार का सार है, जहाँ ईश्वर केवल खोज का अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि वह स्वयं ही साधक के भीतर की प्रेरणा और खोज की प्रक्रिया भी है। आप ही 'मुब्तदा' (आरंभ) और 'मुंतहा' (अंत) हैं, यानी सृष्टि और उसकी यात्रा का स्रोत भी आप हैं और अंतिम मंज़िल भी आप ही हैं। यह शे'र अगले शे'र (beyt 4) के लिए ज़मीन तैयार करता है, जहाँ बताया जाएगा कि यह प्रियतम कैसे हमारे सीनों के भीतर ही विचारों को सजाता है और कैसे वह ख़ुद ही सवाल और ख़ुद ही जवाब बन जाता है। यहाँ 'तुम' का संबोधन प्रियतम की पूर्ण और विरोधाभासी एकता को दर्शाता है, जो हर द्वैत से परे है।

حاجِبद्वारपाल, दरबान, राजा से मिलने की अनुमति देने वाला अधिकारीواجِبअनिवार्य, आवश्यक, ज़रूरीمطلبलक्ष्य, गंतव्य, जिसकी तलाश होطالبसाधक, खोजने वाला, चाहने वालाمُنتهاअंत, सीमा, चरमمُبتداआरंभ, शुरुआत, स्रोत

पूरी ग़ज़ल ↗

  1. 1 اِی رَستخیزِ ناگهان وی رحمتِ بی‌مُنتها·اِی آتشی اَفروخته، در بیشهٔ اَندیشه‌ها
  2. 2 امروز خَندان آمدی، مِفتاحِ زندان آمدی·بر مُستمندان آمدی، چون بَخشش و فَضلِ خدا
  3. 3 خورشید را حاجِب تویی، اومید را واجِب تویی·مطلب تویی طالب تویی، هم مُنتها هم مُبتدا
  4. 4 در سینه‌ها برخاسته، اندیشه را آراسته·هَم خویش حاجَت خواسته، هَم خویشتن کَرده رَوا
  5. 5 اِی روح‌بخشِ بی‌بَدَل، وِی لَذّتِ علم و عمل·باقی بهانه‌ست و دَغَل، کاین علّت آمد وان دَوا
  6. 6 ما زان دَغَل کَژبین شده، با بی‌گُنه در کین شده·گَه مَستِ حورَالعین شده، گَه مستِ نان و شوربا
  7. 7 این سُکر بین هِل عَقل را، وین نُقل بین هِل نَقل را·کَز بهرِ نان و بَقل را، چندین نشاید ماجرا
  8. 8 تَدبیرِ صَد رَنگ اَفکنی، بَر روم و بَر زَنگ اَفکنی·وَ اندر میان جَنگ اَفکنی، «فی اِصطِناعٍ لا یُری»
  9. 9 می‌مال پنهان گوشِ جان، می‌نِه بَهانه بَر کَسان·جان «رَبِّ خَلِّصنی» زَنان، والله که لاغ است ای کیا
  10. 10 خامُش که بَس مُستَعجِلَم، رَفتم سویِ پایِ عَلَم·کاغذ بِنِه بِشکن قَلَم، ساقی دَرآمد الصَلا

ganjoor: sh1 · public domain