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بخش ۱ - تمامت کتاب الموطد الکریم

किताब अल-मुवतद अल-करीम का पूरा होना

  1. M6:1 ای حیات دل حسام‌الدین بسیمیل می‌جوشد به قسم سادسی ऐ दिल की जान, हुसामुद्दीन, बहुत ज़्यादा,छठे हिस्से (क़िस्म-ए-सादसी) के लिए उमड़ रही है इच्छा।मौलाना, हुसामुद्दीन चेलबी को संबोधित करते हुए कहते हैं कि उनके भीतर मसनवी की छठी और अंतिम पुस्तक शुरू करने की एक प्रबल इच्छा और गहरा शौक़ पैदा हो गया है। ❋
  2. M6:2 گشت از جذب چو تو علامه‌ایدر جهان گردان حسامی نامه‌ای तेरे जैसे 'अल्लामा' के कशिश से ही,दुनिया में घूमने लगा एक 'हुसामी-नामा' भी।यह शेर इस बात की ओर इशारा करता है कि हुसामुद्दीन चेलबी की प्रेरणा और आध्यात्मिक खिंचाव के कारण ही मसनवी की रचना हुई, जिसे रूमी ने उनकी भूमिका के सम्मान में 'हुसामी-नामा' कहा। ❋
  3. M6:3 پیش‌کش می‌آرمت ای معنویقسم سادس در تمام مثنوی ऐ मेरे आध्यात्मिक मित्र, मैं यह भेंट तुम्हारे लिए लाया हूँ,यह छठा खंड, जो पूरी मसनवी को संपूर्ण करता है।मौलाना मसनवी के इस छठे खंड को हुसामुद्दीन को समर्पित करते हैं और इसे पूरी मसनवी की समाप्ति और पूर्णता मानते हैं। ❋
  4. M6:4 شش جهت را نور ده زین شش صحفکی یطوف حوله من لم یطف छह दिशाओं को रौशन कर दे इन छह धर्मग्रंथों से,ताकि वो भी परिक्रमा करे जिसने कभी परिक्रमा नहीं की।यह शेर مثنوی (मसनवी) को पूरे ब्रह्मांड के लिए प्रकाश का स्रोत बताता है, और यह कहता है कि इसका अध्ययन करना उन लोगों के लिए एक आध्यात्मिक परिक्रमा (तवाफ़) के समान है जिन्होंने काबा की परिक्रमा नहीं की है या जो एक गहरी परिक्रमा की तलाश में हैं। ❋
  5. M6:5 عشق را با پنج و با شش کار نیستمقصد او جز که جذب یار نیست इश्क़ को पाँच और छह से कोई वास्ता नहीं,उसका मक़सद यार के आकर्षण के सिवा कुछ नहीं।सच्चे इश्क़ का दायरा पाँच इंद्रियों और भौतिक दुनिया की छह दिशाओं से परे है; उसका एकमात्र लक्ष्य प्रियतम (ईश्वर) की ओर खिंच जाना और उसमें विलीन हो जाना है। ❋
  6. M6:6 بوک فیما بعد دستوری رسدرازهای گفتنی گفته شود शायद कि इसके बाद इजाज़त मिले,और कहने के क़ाबिल राज़ कह दिए जाएँ।मौलाना मसनवी की छठी किताब की शुरुआत में यह उम्मीद जताते हैं कि शायद दैवीय अनुमति से, वे उन गहरे रहस्यों को स्पष्ट रूप से कह पाएँगे जो अब तक इशारों-इशारों में छिपे हुए थे। ❋
  7. M6:7 یا بیانی که بود نزدیکترزین کنایات دقیق مستتر या कोई बयान जो हो और भी क़रीब,इन बारीक, छुपे हुए इशारों से।मौलाना यह उम्मीद ज़ाहिर करते हैं कि भविष्य में उन्हें हक़ीक़त को और ज़्यादा सीधे और साफ़ तौर पर बयान करने की इजाज़त मिलेगी, न कि उन पेचीदा और छुपे हुए इशारों के ज़रिए जो वह अब तक इस्तेमाल करते आए हैं। ❋
  8. M6:8 راز جز با رازدان انباز نیستراز اندر گوش منکر راز نیست राज़, राज़दाँ बिन किसी का हमराज़ नहीं,इनकार करने वाले के कान में, राज़ कोई राज़ नहीं।गहन सत्य और अस्तित्व के रहस्य केवल उन्हीं के लिए प्रकट होते हैं जो उन्हें समझने के लिए तैयार हैं; जो लोग इनकार करते हैं या तैयार नहीं हैं, उनके लिए ये बातें साधारण और अर्थहीन बनी रहती हैं। ❋
  9. M6:9 لیک دعوت واردست از کردگاربا قبول و ناقبول او را چه کار परन्तु सृष्टिकर्ता की ओर से निमंत्रण तो आ चुका है,उसे इसके स्वीकार या अस्वीकार से क्या लेना-देना?यह बेत (पद्य) बताता है कि ईश्वरीय निमंत्रण हमेशा ईश्वर की ओर से भेजा जाता है, और यह मनुष्यों द्वारा उसे स्वीकार या अस्वीकार किए जाने से स्वतंत्र है; ईश्वर का कार्य प्राणियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर नहीं है। ❋
  10. M6:10 نوح نهصد سال دعوت می‌نموددم به دم انکار قومش می‌فزود नूह नौ सौ साल तक दावत देते रहे,हर लम्हा उनकी क़ौम का इनकार बढ़ता गया।यह शेर हज़रत नूह के अपनी क़ौम के प्रति धैर्य को दर्शाता है, जो नौ सौ साल के निरंतर निमंत्रण के बावजूद, हर पल उनके इनकार को और ज़्यादा बढ़ते हुए देखते रहे। ❋
  11. M6:11 هیچ از گفتن عنان واپس کشیدهیچ اندر غار خاموشی خزید क्या उसने कभी कहने से लगाम खींची?क्या वह कभी ख़ामोशी की गुफ़ा में जा छिपा?यह एक अलंकारिक प्रश्न है, जिसका अर्थ है कि नूह जैसे पैगंबर ने, अपनी क़ौम के इनकार का सामना करते हुए भी, कभी भी सच कहना नहीं छोड़ा और न ही ख़ामोशी में पनाह ली। ❋
  12. M6:12 گفت از بانگ و علالای سگانهیچ واگردد ز راهی کاروان कहा, कुत्तों के भौंकने और चिल्लाने से,क्या कोई कारवाँ कभी राह से लौटता है?यह एक अलंकारिक प्रश्न है जिसका अर्थ है कि आलोचकों या अज्ञानियों का शोर कभी भी सत्य के खोजियों और ईश्वरीय मार्गदर्शन के कारवाँ को उसके मार्ग से नहीं भटका सकता। ❋
  13. M6:13 یا شب مهتاب از غوغای سگسست گردد بدر را در سیر تگ या चाँदनी रात में कुत्तों के शोर से,क्या धीमा पड़ जाए पूनम का चाँद अपनी चाल में?मौलाना यह सवाल पूछते हैं: क्या धरती पर कुत्तों के भौंकने से आसमान में चमकता पूरा चाँद अपने रास्ते से भटक सकता है या धीमा हो सकता है? इसका छिपा हुआ जवाब है 'नहीं', क्योंकि सत्य और सौंदर्य रुकावटों की परवाह किए बिना अपना रास्ता तय करते हैं। ❋
  14. M6:14 مه فشاند نور و سگ عو عو کندهر کسی بر خلقت خود می‌تند चाँदनी बिखेरे चाँद और कुत्ता भौं-भौं करे,हर कोई अपनी ही फ़ितरत की चादर बुने।यह शेर बताता है कि हर प्राणी, चाहे वह महान हो या तुच्छ, अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुसार ही काम करता है, और एक का काम दूसरे के काम में बाधा नहीं डालता। ❋
  15. M6:15 هر کسی را خدمتی داده قضادر خور آن گوهرش در ابتلا हर एक को क़ज़ा ने सौंपी है एक ख़िदमत,उसके जौहर के लायक़, इम्तिहान के आलम में।ईश्वरीय विधान (क़ज़ा) ने हर किसी को एक विशेष सेवा सौंपी है, जो उसके आंतरिक सार (जौहर) के अनुरूप है और जिसे परीक्षण और आज़माइश के माध्यम से परखा जाता है। ❋
  16. M6:16 چونک نگذارد سگ آن نعرهٔ سقممن مهم سیران خود را چون هلم जब कुत्ता अपनी वो बीमार चीख़ नहीं छोड़ता,तो मैं अपने अहम मुसाफ़िरों को कैसे छोड़ दूँ?रूमी, अपनी तुलना चाँद से करते हुए कहते हैं कि जैसे चाँद कुत्तों के भौंकने से रौशनी देना नहीं छोड़ता, वैसे ही वे भी निंदकों के शोर के कारण अपने आध्यात्मिक साधकों का मार्गदर्शन करना बंद नहीं करेंगे। ❋
  17. M6:17 چونک سرکه سرکگی افزون کندپس شکر را واجب افزونی بود जब सिरका अपनी खटास और तेज़ी बढ़ाता है,तब शक्कर के लिए भी अपनी मिठास बढ़ाना ज़रूरी हो जाता है।यह शेर सृष्टि में विरोधी शक्तियों के आपसी संतुलन और मुआवज़े के सिद्धांत को बताता है; जब भी कोई एक विरोधी तत्व बढ़ता है, तो संतुलन बनाए रखने के लिए दूसरे तत्व को भी ख़ुद को मज़बूत करना पड़ता है। ❋
  18. M6:18 قهر سرکه لطف هم‌چون انگبینکین دو باشد رکن هر اسکنجبین क़हर सिरका है, लुत्फ़ शहद की मिठास,कि ये दोनों ही हैं हर सिकंजबीन की बुनियाद।यह शेर बताता है कि क़हर (क्रोध) और लुत्फ़ (कृपा) जैसे प्रतीत होने वाले विरोधी तत्व, किसी भी संतुलित व्यवस्था के आवश्यक घटक हैं, जो मिलकर एक लाभकारी संपूर्ण बनाते हैं। ❋
  19. M6:19 انگبین گر پای کم آرد ز خلآید آن اسکنجبین اندر خلل शहद अगर सिरके से कम पड़ जाए,तो उस सिकंजबीन में ख़लल पड़ जाए।एक संतुलित और उत्तम मिश्रण, जैसे सिकंजबीन बनाने के लिए, मीठे और खट्टे दोनों घटकों का उचित अनुपात में होना आवश्यक है; अन्यथा, परिणाम दोषपूर्ण और अधूरा होगा। ❋
  20. M6:20 قوم بر وی سرکه‌ها می‌ریختندنوح را دریا فزون می‌ریخت قند क़ौम उन पर सिरके बरसा रही थी,नूह के लिए समंदर और शक्कर उंडेल रहा था।लोग हज़रत नूह के साथ कड़वाहट और सख़्ती से पेश आ रहे थे, लेकिन ख़ुदा की रहमत का समंदर उन पर और ज़्यादा मिठास और मेहरबानी बरसा रहा था और उनकी मदद कर रहा था। ❋
  21. M6:21 قند او را بد مدد از بحر جودپس ز سرکهٔ اهل عالم می‌فزود उसकी शक्कर को उदारता के सागर से मदद मिलती थी,और दुनिया वालों के सिरके से वह और भी बढ़ती जाती थी।अल्लाह के वली (संत) को ईश्वर की असीम कृपा से शक्ति मिलती है, और दुनिया के लोगों की कड़वाहट और विरोध उसकी आंतरिक मिठास और दृढ़ता को कम करने के बजाय और भी बढ़ा देते हैं। ❋
  22. M6:22 واحد کالالف کی بود آن ولیبلک صد قرنست آن عبدالعلی एक हज़ार के बराबर कैसे हो सकता है वो वली?बल्कि सौ सदियाँ है वो, वो अब्द-उल-अली।यह शेर ईश्वर के किसी संत (वली) के अपार और अतुलनीय मूल्य पर ज़ोर देता है, जिसका आध्यात्मिक प्रभाव हज़ारों लोगों या सैकड़ों पीढ़ियों के बराबर होता है, क्योंकि वे ईश्वर की कृपा और उदारता के माध्यम बनते हैं। ❋
  23. M6:23 خم که از دریا درو راهی شودپیش او جیحونها زانو زند वो मटका जिसमें समंदर से राह खुल जाए,उसके आगे बड़ी-बड़ी नदियाँ भी घुटने टेक दें।यह शेर उस इंसान के ऊँचे मक़ाम और शान को बयान करता है जो हक़ीक़त के समंदर से जुड़ गया हो; ऐसा इंसान इतनी अज़मत (महानता) हासिल कर लेता है कि दुनिया की तमाम ज़ाहिरी ताक़तें उसके सामने झुक जाती हैं। ❋
  24. M6:24 خاصه این دریا که دریاها همهچون شنیدند این مثال و دمدمه ख़ासतौर से ये समंदर, कि बाक़ी सारे समंदर,जब सुनते हैं इसकी मिसाल और इसकी धूम-धाम।यह शेर ईश्वर की कृपा और अस्तित्व के असीम सागर की महानता का वर्णन करता है; एक ऐसा सागर जिसके सामने, अस्तित्व के अन्य सभी सागर शर्म और लज्जा से खुद को तुच्छ महसूस करते हैं। ❋
  25. M6:25 شد دهانشان تلخ ازین شرم و خجلکه قرین شد نام اعظم با اقل इस शर्म और लज्जा से उनका मुँह कड़वा हो गया,कि सबसे बड़ा नाम (नाम-ए-आज़म) सबसे छोटे के साथ जुड़ गया।अस्तित्व के अन्य रूप (दूसरे समुद्र) जब ईश्वर की महानता को देखते हैं, तो शर्म से उनका मुँह कड़वा हो जाता है, क्योंकि ईश्वर (सबसे बड़ा नाम) एक संत या इस भौतिक दुनिया जैसी सबसे छोटी चीज़ के साथ जुड़ा हुआ है। ❋
  26. M6:26 در قران این جهان با آن جهاناین جهان از شرم می‌گردد جِهان इस जहाँ का उस जहाँ से जब हो क़िरान,शर्म से ये जहाँ जाता है काँप और उछल।जब इस भौतिक दुनिया को उस आध्यात्मिक और अनदेखी दुनिया के साथ रखकर तौला जाता है, तो यह दुनिया अपनी तुच्छता के कारण शर्म से काँप उठती है और बेचैन हो जाती है। ❋
  27. M6:27 این عبارت تنگ و قاصر رتبتستورنه خس را با اخص چه نسبتست यह अभिव्यक्ति तंग है और इसका दर्जा बहुत कम है,वरना एक तिनके का उस परम विशेष से क्या वास्ता है।रूमी यहाँ स्वीकार करते हैं कि उनकी बातें और इंसानी भाषा, ईश्वर की असीम महानता और अद्वितीय स्वभाव का वर्णन करने में स्वाभाविक रूप से अपर्याप्त और असमर्थ हैं। ❋
  28. M6:28 زاغ در رز نعرهٔ زاغان زندبلبل از آواز خوش کی کم کند कौआ बाग़ में कौओं की तरह काँव-काँव करता है,बुलबुल अपनी मीठी आवाज़ से कब परहेज़ करता है?यह शेर इस बात पर ज़ोर देता है कि बेसुरी और बुरी आवाज़ों की मौजूदगी, कभी भी दिलकश और असली नग़मों को गाने से नहीं रोकती, और न ही उनके मूल्य को कम करती है। ❋
  29. M6:29 پس خریدارست هر یک را جدااندرین بازار یفعل ما یشا तो हर एक का है अलग ख़रीदार यहाँ,इस बाज़ार में, जहाँ वो करता है जो चाहे।सृष्टि के इस बाज़ार में, जहाँ ईश्वर अपनी इच्छानुसार कार्य करता है, वह हर एक चीज़ का, चाहे वह हमें कितनी ही तुच्छ क्यों न लगे, अलग-अलग मूल्य समझता है और उसके लिए एक विशेष उद्देश्य निर्धारित करता है। ❋
  30. M6:30 نقل خارستان غذای آتش استبوی گل قوت دماغ سرخوش است काँटों की बाड़ आग का निवाला है,फूल की महक मगन मन की शक्ति है।इस दुनिया में हर चीज़ का, यहाँ तक कि सबसे तुच्छ चीज़ का भी, एक काम और एक मक़सद है: जैसे सूखी झाड़ी आग का भोजन बनती है, वैसे ही फूल की सुगंध आनंदित मन को पोषण देती है। ❋
  31. M6:31 گر پلیدی پیش ما رسوا بودخوک و سگ را شکر و حلوا بود गर गंदगी हमारी नज़र में अपमानजनक है,तो सूअर और कुत्ते के लिए वही शक्कर और हलवा है।यह शेर बताता है कि जो चीज़ इंसानों की नज़र में घृणित और अपवित्र है, वह सृष्टि की व्यवस्था में उद्देश्यहीन नहीं है, बल्कि दूसरे प्राणियों के लिए जीवन का स्रोत और स्वादिष्ट भोजन है। ❋
  32. M6:32 گر پلیدان این پلیدیها کنندآبها بر پاک کردن می‌تنند गर अपवित्र लोग ये अपवित्रताएँ करें,तो जल उन्हें स्वच्छ करने का यत्न करते हैं।यह शेर दुनिया में एक दिव्य विधान को दर्शाता है, जिसके अनुसार हर अपवित्रता और गंदगी के सामने, उसे साफ़ और शुद्ध करने वाली एक शक्ति भी रखी गई है। ❋
  33. M6:33 گرچه ماران زهرافشان می‌کنندورچه تلخان‌مان پریشان می‌کنند भले ही साँप अपना ज़हर उगलते रहें,और कड़वाहटें हमें बेचैन करती रहें।यह बेत कहता है कि ख़तरों और मुश्किलों (जैसे साँप का ज़हर और कड़वे अनुभवों की बेचैनी) के बावजूद, दुनिया में एक छिपी हुई हिकमत (प्रज्ञा) और व्यवस्था है, जो हर बुराई के सामने एक भलाई या इलाज रखती है। ❋
  34. M6:34 نحلها بر کوه و کندو و شجرمی‌نهند از شهد انبار شکر मधुमक्खियाँ पहाड़, छत्ते और पेड़ों परशहद से शक्कर के भंडार भर देती हैं।यह शेर सृष्टि में ईश्वरीय विवेक की ओर इशारा करता है, यह दर्शाता है कि कैसे हानिकारक तत्वों के साथ-साथ, ईश्वर ने अच्छाई और मिठास के लिए भी एक रचनात्मक शक्ति रखी है। ❋
  35. M6:35 زهرها هرچند زهری می‌کنندزود تریاقاتشان بر می‌کنند ज़हर चाहे जितना भी ज़हरीला असर करें,उनके तोड़ भी फ़ौरन उठ खड़े होते हैं।यह शेर सृष्टि में ईश्वर के विवेकपूर्ण विधान की ओर इशारा करता है; प्रकृति में हर हानिकारक तत्व के साथ उसका तोड़ या इलाज भी मौजूद होता है। ❋
  36. M6:36 این جهان جنگست کل چون بنگریذره با ذره چو دین با کافری यह जहाँ कुल जंग है, जब तू देखे ग़ौर से,ज़र्रा ज़र्रे से लड़े, ज्यों दीं काफ़िरी से।अगर तुम इस दुनिया को ग़ौर से देखो, तो इसे पूरी तरह से एक जंग पाओगे; हर कण दूसरे कण के साथ संघर्ष में है, ठीक वैसे ही जैसे ईमान कुफ़्र के साथ संघर्ष में है। ❋
  37. M6:37 آن یکی ذره همی پرد به چپوآن دگر سوی یمین اندر طلب ❋
  38. M6:38 ذره‌ای بالا و آن دیگر نگونجنگ فعلیشان ببین اندر رکون ❋
  39. M6:39 جنگ فعلی هست از جنگ نهانزین تخالف آن تخالف را بدان ❋
  40. M6:40 ذره‌ای کان محو شد در آفتابجنگ او بیرون شد از وصف و حساب ❋
  41. M6:41 چون ز ذره محو شد نفس و نفسجنگش اکنون جنگ خورشیدست بس ❋
  42. M6:42 رفت از وی جنبش طبع و سکوناز چه از انا الیه راجعون
  43. M6:43 ما به بحر تو ز خود راجع شدیموز رضاع اصل مسترضع شدیم ❋
  44. M6:44 در فروع راه ای مانده ز غوللاف کم زن از اصول ای بی‌اصول ❋
  45. M6:45 جنگ ما و صلح ما در نور عیننیست از ما هست بین اصبعین ❋
  46. M6:46 جنگ طبعی جنگ فعلی جنگ قولدر میان جزوها حربیست هول ❋
  47. M6:47 این جهان زین جنگ قایم می‌بوددر عناصر در نگر تا حل شود ❋
  48. M6:48 چار عنصر چار استون قویستکه بدیشان سقف دنیا مستویست ❋
  49. M6:49 هر ستونی اشکنندهٔ آن دگراستن آب اشکنندهٔ آن شرر ❋
  50. M6:50 پس بنای خلق بر اضداد بودلاجرم ما جنگییم از ضر و سود ❋
  51. M6:51 هست احوالم خلاف همدگرهر یکی با هم مخالف در اثر ❋
  52. M6:52 چونک هر دم راه خود را می‌زنمبا دگر کس سازگاری چون کنم ❋
  53. M6:53 موج لشکرهای احوالم ببینهر یکی با دیگری در جنگ و کین ❋
  54. M6:54 می‌نگر در خود چنین جنگ گرانپس چه مشغولی به جنگ دیگران ❋
  55. M6:55 یا مگر زین جنگ حقت وا خرددر جهان صلح یک رنگت برد ❋
  56. M6:56 آن جهان جز باقی و آباد نیستزانک آن ترکیب از اضداد نیست ❋
  57. M6:57 این تفانی از ضد آید ضد راچون نباشد ضد نبود جز بقا ❋
  58. M6:58 نفی ضد کرد از بهشت آن بی‌نظیرکه نباشد شمس و ضدش زمهریر ❋
  59. M6:59 هست بی‌رنگی اصول رنگهاصلحها باشد اصول جنگها ❋
  60. M6:60 آن جهانست اصل این پرغم وثاقوصل باشد اصل هر هجر و فراق ❋
  61. M6:61 این مخالف از چه‌ایم ای خواجه ماواز چه زاید وحدت این اعداد را ❋
  62. M6:62 زانک ما فرعیم و چار اضداد اصلخوی خود در فرع کرد ایجاد اصل ❋
  63. M6:63 گوهر جان چون ورای فصلهاستخوی او این نیست خوی کبریاست ❋
  64. M6:64 جنگها بین کان اصول صلحهاستچون نبی که جنگ او بهر خداست ❋
  65. M6:65 غالبست و چیر در هر دو جهانشرح این غالب نگنجد در دهان ❋
  66. M6:66 آب جیحون را اگر نتوان کشیدهم ز قدر تشنگی نتوان برید ❋
  67. M6:67 گر شدی عطشان بحر معنویفرجه‌ای کن در جزیرهٔ مثنوی ❋
  68. M6:68 فرجه کن چندانک اندر هر نفسمثنوی را معنوی بینی و بس ❋
  69. M6:69 باد که را ز آب جو چون وا کندآب یک‌رنگی خود پیدا کند ❋
  70. M6:70 شاخهای تازهٔ مرجان ببینمیوه‌های رسته ز آب جان ببین ❋
  71. M6:71 چون ز حرف و صوت و دم یکتا شودآن همه بگذارد و دریا شود ❋
  72. M6:72 حرف‌گو و حرف‌نوش و حرفهاهر سه جان گردند اندر انتها ❋
  73. M6:73 نان‌دهنده و نان‌ستان و نان‌پاکساده گردند از صور گردند خاک ❋
  74. M6:74 لیک معنیشان بود در سه مقامدر مراتب هم ممیز هم مدام ❋
  75. M6:75 خاک شد صورت ولی معنی نشدهر که گوید شد تو گویش نی نشد ❋
  76. M6:76 در جهان روح هر سه منتظرگه ز صورت هارب و گه مستقر ❋
  77. M6:77 امر آید در صور رو در رودباز هم ز امرش مجرد می‌شود ❋
  78. M6:78 پس له الخلق و له الامرش بدانخلق صورت امر جان راکب بر آن ❋
  79. M6:79 راکب و مرکوب در فرمان شاهجسم بر درگاه وجان در بارگاه ❋
  80. M6:80 چونک خواهد که آب آید در سبوشاه گوید جیش جان را که ارکبوا
  81. M6:81 باز جانها را چو خواند در علوبانگ آید از نقیبان که انزلوا
  82. M6:82 بعد ازین باریک خواهد شد سخنکم کن آتش هیزمش افزون مکن
  83. M6:83 تا نجوشد دیگهای خرد زوددیگ ادراکات خردست و فرود
  84. M6:84 پاک سبحانی که سیبستان کنددر غمام حرفشان پنهان کنند
  85. M6:85 زین غمام بانگ و حرف و گفت و گویپرده‌ای کز سیب ناید غیر بوی
  86. M6:86 باری افزون کش تو این بو را به هوشتا سوی اصلت برد بگرفته گوش
  87. M6:87 بو نگه‌دار و بپرهیز از زکامتن بپوش از باد و بود سرد عام
  88. M6:88 تا نینداید مشامت را ز اثرای هواشان از زمستان سردتر
  89. M6:89 چون جمادند و فسرده و تن‌شگرفمی‌جهد انفاسشان از تل برف ❋
  90. M6:90 چون زمین زین برف در پوشد کفنتیغ خورشید حسام‌الدین بزن ❋
  91. M6:91 هین بر آر از شرق سیف‌الله راگرم کن زان شرق این درگاه را ❋
  92. M6:92 برف را خنجر زند آن آفتابسیلها ریزد ز کُه ها بر تراب ❋
  93. M6:93 زانک لا شرقیست و لا غربیست اوبا منجم روز و شب حربیست او ❋
  94. M6:94 که چرا جز من نجوم بی‌هدیقبله کردی از لئیمی و عمی ❋
  95. M6:95 نا خوشت ناید مقال آن امیندر نبی که لا احب الآفلین
  96. M6:96 از قزح در پیش مه بستی کمرزان همی رنجی ز وانشق القمر
  97. M6:97 منکری این را که شمس کورتشمس پیش تست اعلی‌مرتبت
  98. M6:98 از ستاره دیده تصریف هواناخوشت آید اذا النجم هوی ❋
  99. M6:99 خود مؤثرتر نباشد مه ز نانای بسا نان که ببرد عرق جان ❋
  100. M6:100 خود مؤثرتر نباشد زهره زآبای بسا آبا که کرد او تن خراب ❋
  101. M6:101 مهر آن در جان تست و پند دوستمی‌زند بر گوش تو بیرون پوست ❋
  102. M6:102 پند ما در تو نگیرد ای فلانپند تو در ما نگیرد هم بدان ❋
  103. M6:103 جز مگر مفتاح خاص آید ز دوستکه مقالید السموات آن اوست ❋
  104. M6:104 این سخن هم‌چون ستاره‌ست و قمرلیک بی‌فرمان حق ندهد اثر ❋
  105. M6:105 این ستارهٔ بی‌جهت تاثیر اومی‌زند بر گوشهای وحی‌جو ❋
  106. M6:106 کی بیایید از جهت تا بی‌جهاتتا ندراند شما را گرگ مات ❋
  107. M6:107 آنچنان که لمعهٔ درپاش اوستشمس دنیا در صفت خفاش اوست ❋
  108. M6:108 هفت چرخ ازرقی در رق اوستپیک ماه اندر تب و در دق اوست ❋
  109. M6:109 زهره چنگ مسئله در وی زدهمشتری با نقد جان پیش آمده
  110. M6:110 در هوای دستبوس او زحللیک خود را می‌نبیند از محل ❋
  111. M6:111 دست و پا مریخ چندین خست ازووآن عطارد صد قلم بشکست ازو ❋
  112. M6:112 با منجم این همه انجم به جنگکای رها کرده تو جان بگزیده رنگ ❋
  113. M6:113 جان ویست و ما همه رنگ و رقومکوکب هر فکر او جان نجوم ❋
  114. M6:114 فکر کو آنجا همه نورست پاکبهر تست این لفظ فکر ای فکرناک
  115. M6:115 هر ستاره خانه دارد در علاهیچ خانه در نگنجد نجم ما ❋
  116. M6:116 جای سوز اندر مکان کی در رودنور نامحدود را حد کی بود ❋
  117. M6:117 لیک تمثیلی و تصویری کنندتا که در یابد ضعیفی عشقمند ❋
  118. M6:118 مثل نبود لیک باشد آن مثیلتا کند عقل مجمد را گسیل ❋
  119. M6:119 عقل سر تیزست لیکن پای سستزانک دل ویران شدست و تن درست ❋
  120. M6:120 عقلشان در نقل دنیا پیچ پیچفکرشان در ترک شهوت هیچ هیچ ❋
  121. M6:121 صدرشان در وقت دعوی هم‌چو شرقصبرشان در وقت تقوی هم‌چو برق ❋
  122. M6:122 عالمی اندر هنرها خودنماهم‌چو عالم بی‌وفا وقت وفا ❋
  123. M6:123 وقت خودبینی نگنجد در جهاندر گلو و معده گم گشته چو نان
  124. M6:124 این همه اوصافشان نیکو شودبد نماند چونک نیکوجو شود ❋
  125. M6:125 گر منی گنده بود هم‌چون منیچون به جان پیوست یابد روشنی ❋
  126. M6:126 هر جمادی که کند رو در نباتاز درخت بخت او روید حیات ❋
  127. M6:127 هر نباتی کان به جان رو آوردخضروار از چشمهٔ حیوان خورد
  128. M6:128 باز جان چون رو سوی جانان نهدرخت را در عمر بی‌پایان نهد