पढ़िएदफ़्तर 6

दफ़्तर 6 · 4911 शेर · 140 खंड

دفتر ششم

Book VI

دیباچهٔ دفتر ششم · فارسی

بسم الله الرحمن الرحیم

مُجلّد ششم از دفترهای مثنوی و بیّنات معنوی که مصباح ظلام وهْم و شُبْهت و خیالات و شکّ و ریبت باشد، و این مصباح را به حسّ حیوانی ادارک نتوان کردن، زیرا مقام حیوانی اسْفل سافلین است که ایشان را از بهر عمارت صورت عالم اسفل آفریده اند و بر حواسّ و مدارک ایشان دایره‌یی کشیده‌اند که از آن دایره تجاوز نکنند، ﴿ذالک تقدیر العزیز العلیم﴾ یعنی مقدار رسیدن عمل ایشان و جولان نظر ایشان پدید کرد، چنان که هر ستاره را مقداری ست و کارگاهی از فلک که تا آن حد عمل او برسد و همچون حاکم شهری که حکم او در آن شهر نافذ باشد، گس واری توابع آن شهر او حاکم نباشد. عصمنا الله من حبسه و ختمه و ما حجب به المحجوبین آمین یا رب العالمین.

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  1. 001 بخش ۱ - تمامت کتاب الموطد الکریمकिताब अल-मुवतद अल-करीम का पूरा होना 128 शेर
  2. 002 بخش ۲ - سؤال سایل از مرغی کی بر سر ربض شهری نشسته باشد سر او فاضل‌ترست و عزیزتر و شریف‌تر و مکرم‌تر یا دم او و جواب دادن واعظ سایل را به قدر فهم اوशहर की दीवार पर बैठे एक पक्षी से सवाल करने वाला कि उसका सिर ज़्यादा फ़ाज़िल, अज़ीज़, शरीफ़ और मुकर्रम है या उसकी पूंछ, और वा'इज़ का सवाल करने वाले को उसकी समझ के मुताबिक़ जवाब देना 54 शेर
  3. 003 بخش ۳ - نکوهیدن ناموسهای پوسیده را کی مانع ذوق ایمان و دلیل ضعف صدق‌اند و راه‌زن صد هزار ابله چنانک راه‌زن آن مخنث شده بودند گوسفندان و نمی‌یارست گذشتن و پرسیدن مخنث از چوپان کی این گوسفندان تو مرا عجب گزند گفت ای مردی و در تو رگ مردی هست همه فدای تو اند و اگر مخنثی هر یکی ترا اژدرهاست مخنثی دیگر هست کی چون گوسفندان را بیند در حال از راه باز گردد نیارد پرسیدن ترسد کی اگر بپرسم گوسفندان در من افتند و مرا بگزندपुरानी परंपराओं की निंदा करना जो ईमान के स्वाद में बाधा डालती हैं और सच्चाई की कमज़ोरी का सबूत हैं, और लाखों बेवक़ूफ़ों की राहज़नी करती हैं, जैसे कि उन्होंने उस हिजड़े की राहज़नी की थी भेड़ें और वह गुज़र नहीं पा रहा था, और हिजड़े ने चरवाहे से पूछा कि 'ये तुम्हारी भेड़ें मुझे अजीब तरह से चोट पहुँचाती हैं', उसने कहा 'ऐ मर्द, अगर तुम में मर्दानगी की रग है, तो सभी तुम्हारी क़ुर्बान हैं, और अगर तुम हिजड़े हो, तो हर एक तुम्हारे लिए अजगर है'। एक और हिजड़ा है जो भेड़ों को देखते ही रास्ते से लौट जाता है, पूछने की हिम्मत नहीं करता, डरता है कि अगर मैं पूछूँगा तो भेड़ें मुझ पर टूट पड़ेंगी और मुझे काटेंगी। 27 शेर
  4. 004 بخش ۴ - مناجات و پناه جستن به حق از فتنهٔ اختیار و از فتنهٔ اسباب اختیار کی سماوات و ارضین از اختیار و اسباب اختیار شکوهیدند و ترسیدند و خلقت آدمی مولع افتاد بر طلب اختیار و اسباب اختیار خویش چنانک بیمار باشد خود را اختیار کم بیند صحت خواهد کی سبب اختیارست تا اختیارش بیفزاید و منصب خواهد تا اختیارش بیفزاید و مهبط قهر حق در امم ماضیه فرط اختیار و اسباب اختیار بوده است هرگز فرعون بی‌نوا کس ندیده استविकल्प के फ़ितने से और विकल्प के साधनों के फ़ितने से अल्लाह की शरण मांगना, क्योंकि आसमान और ज़मीन ने विकल्प और विकल्प के साधनों से शिकायत की और डर गए, और इंसान की ख़िलक़त अपने विकल्प और विकल्प के साधनों की तलाश में मुब्तिला हो गई, जैसे बीमार व्यक्ति खुद को कम विकल्प वाला देखता है और सेहत चाहता है जो विकल्प का कारण है ताकि उसका विकल्प बढ़ जाए, और पद चाहता है ताकि उसका विकल्प बढ़ जाए, और अतीत की उम्मतों में अल्लाह के क़हर का महबूत अत्यधिक विकल्प और विकल्प के साधनों के कारण था, फ़िरऔन को कभी कोई बेनवा नहीं देखा गया है 39 शेर
  5. 005 بخش ۵ - حکایت غلام هندو کی به خداوند‌زادهٔ خود پنهان هوای آورده بود چون دختر را با مهتر‌زاده‌ای عقد کردند غلام خبر یافت رنجور شد و می‌گداخت و هیچ طبیب علت او را در نمی‌یافت و او را زهرهٔ گفتن نهएक हिंदू गुलाम की कहानी जिसने अपनी मालकिन से चोरी-छिपे मोहब्बत कर ली थी। जब लड़की की शादी एक सरदार के बेटे से तय हुई, तो गुलाम को ख़बर मिली, वह बीमार पड़ गया और घुटने लगा, और कोई भी हकीम उसकी बीमारी का पता नहीं लगा पाया, और उसमें कहने की हिम्मत नहीं थी। 35 शेर
  6. 006 بخش ۶ - صبر فرمودن خواجه مادر دختر را کی غلام را زجر مکن من او را بی‌زجر ازین طمع باز آرم کی نه سیخ سوزد نه کباب خام ماندख़्वाजा का बेटी की माँ को सब्र करने का फ़रमान कि 'ग़ुलाम को ज़बरदस्ती मत करो, मैं उसे बिना ज़बरदस्ती इस लालच से बाज़ कर दूँगा, ताकि न तो सीख जले और न ही कबाब कच्चा रहे' 38 शेर
  7. 007 بخش ۷ - در بیان آنک این غرور تنها آن هندو را نبود بلک هر آدمیی به چنین غرور مبتلاست در هر مرحله‌ای الا من عصم اللهयह बयान करना कि यह ग़ुरूर सिर्फ़ उस हिंदू में नहीं था, बल्कि हर इंसान ऐसे ग़ुरूर से हर पड़ाव पर मुब्तिला है, सिवाय उसके जिसे अल्लाह ने महफ़ूज़ रखा हो 31 शेर
  8. 008 بخش ۸ - در عموم تاویل این آیت کی کلما اوقدوا نارا للحربइस आयत की आम व्याख्या में कि 'जब कभी वे जंग की आग भड़काते हैं' 4 शेर
  9. 009 بخش ۹ - قصه‌ای هم در تقریر اینइसी बात के समर्थन में एक कहानी 28 शेर
  10. 010 بخش ۱۰ - وا نمودن پادشاه به امرا و متعصبان در راه ایاز سبب فضیلت و مرتبت و قربت و جامگی او بریشان بر وجهی کی ایشان را حجت و اعتراض نماندबादशाह का अमीरों और अयाज़ के रास्ते में कट्टरपंथियों को उसकी फ़ज़ीलत, मर्तबा, क़ुरबत और उन पर उसकी जागीरदारी का कारण ऐसे तरीक़े से बताना कि उनके पास कोई दलील और आपत्ति न बचे 16 शेर
  11. 011 بخش ۱۱ - مدافعهٔ امرا آن حجت را به شبههٔ جبریانه و جواب دادن شاه ایشان راअमीरों का उस दलील को मजबूरी के संदेह से टालना और बादशाह का उन्हें जवाब देना 34 शेर
  12. 012 بخش ۱۲ - حکایت آن صیادی کی خویشتن در گیاه پیچیده بود و دستهٔ گل و لاله را کله‌وار به سر فرو کشیده تا مرغان او را گیاه پندارند و آن مرغ زیرک بوی برد اندکی کی این آدمیست کی برین شکل گیاه ندیدم اما هم تمام بوی نبرد به افسون او مغرور شد زیرا در ادراک اول قاطعی نداشت در ادراک مکر دوم قاطعی داشت و هو الحرص و الطمع لا سیما عند فرط الحاجة و الفقر قال النبی صلی الله علیه و سلم کاد الفقر ان یکون کفراउस शिकारी की कहानी जिसने खुद को घास में लपेट लिया था और फूल और लालों का गुलदस्ता टोपी की तरह सिर पर रख लिया था ताकि पक्षी उसे घास समझें, और उस चालाक पक्षी ने थोड़ी-सी बू सूंघ ली कि 'यह आदमी है, इस शक्ल में मैंने घास नहीं देखी', लेकिन उसे पूरी तरह से बू नहीं मिली, वह उसके जादू में आ गया, क्योंकि पहली समझ में उसे कोई निर्णायक सबूत नहीं था, दूसरी चालाकी की समझ में उसे निर्णायक सबूत था, और वह लालच और लोभ था, ख़ासकर अत्यधिक ज़रूरत और गरीबी में। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि 'लगभग गरीबी कुफ़्र हो जाती है' 32 शेर
  13. 013 بخش ۱۳ - حکایت آن شخص کی دزدان قوج او را بدزدیدند و بر آن قناعت نکرد به حیله جامه‌هاش را هم دزدیدندउस व्यक्ति की कहानी जिसके भेड़िए चोरों ने चुरा लिए थे और उस पर संतोष नहीं किया, बल्कि चाल से उसके कपड़े भी चुरा लिए 11 शेर
  14. 014 بخش ۱۴ - مناظرهٔ مرغ با صیاد در ترهب و در معنی ترهبی کی مصطفی علیه‌السلام نهی کرد از آن امت خود را کی لا رهبانیة فی الاسلامपक्षी का शिकारी से रहबानीयत के बारे में बहस करना और रहबानीयत के अर्थ के बारे में, जिससे मुस्तफ़ा अलैहिस्सलाम ने अपनी उम्मत को मना किया था कि 'इस्लाम में कोई रहबानीयत नहीं है' 64 शेर
  15. 015 بخش ۱۵ - حکایت پاسبان کی خاموش کرد تا دزدان رخت تاجران بردند به کلی بعد از آن هیهای و پاسبانی می‌کردउस पहरेदार की कहानी जिसने खामोश होकर चोरों को व्यापारियों का सामान पूरी तरह से चुराने दिया और उसके बाद हल्ला-गुल्ला और पहरेदारी कर रहा था 15 शेर
  16. 016 بخش ۱۶ - حواله کردن مرغ گرفتاری خود را در دام به فعل و مکر و زرق زاهد و جواب زاهد مرغ راपक्षी का अपनी जाल में फँसी हालत को ज़ाहिद के कर्म, मक्कारी और धोखे के हवाले करना और ज़ाहिद का पक्षी को जवाब देना 36 शेर
  17. 017 بخش ۱۷ - حکایت آن عاشق کی شب بیامد بر امید وعدهٔ معشوق بدان وثاقی کی اشارت کرده بود و بعضی از شب منتظر ماند و خوابش بربود معشوق آمد بهر انجاز وعده او را خفته یافت جیبش پر جوز کرد و او را خفته گذاشت و بازگشتउस आशिक़ की कहानी जो रात में माशूक़ के वादे की उम्मीद में उस कमरे में आया था जहाँ इशारा किया गया था, और रात का कुछ हिस्सा इंतज़ार किया और उसे नींद आ गई। माशूक़ वादा पूरा करने आया, उसे सोया हुआ पाया, उसकी जेब अखरोट से भर दी और उसे सोया हुआ छोड़कर वापस लौट गया। 50 शेर
  18. 018 بخش ۱۸ - استدعاء امیر ترک مخمور مطرب را به وقت صبوح و تفسیر این حدیث کی ان لله تعالی شرابا اعده لاولیائه اذا شربوا سکروا و اذا سکروا طابوا الی آخر الحدیث. می در خم اسرار بدان می‌جوشد؛ تا هر که مجردست از آن می‌نوشد قال الله تعالی ان الابرار یشربون این می که تو می‌خوری حرامست ما می نخوریم جز حلالی «جهد کن تا ز نیست هست شوی وز شراب خدای مست شوی»शराबी तुर्क अमीर का सुबह के समय गायक से अनुरोध और इस हदीस की व्याख्या कि 'अल्लाह त'आला के पास एक ऐसी शराब है जो उसने अपने दोस्तों के लिए तैयार की है, जब वे उसे पीते हैं तो मदहोश हो जाते हैं, और जब मदहोश हो जाते हैं तो अच्छे हो जाते हैं।' शराब रहस्यों के बर्तन में इस तरह उबलती है; ताकि जो भी अकेला है, वह उसे पीता रहे। अल्लाह त'आला ने फ़रमाया, 'निश्चय ही नेक लोग पीते हैं।' यह शराब जो तुम पीते हो, हराम है। हम शराब नहीं पीते सिवाय हलाल के। 'प्रयास करो ताकि तुम नहीं से अस्तित्व में आ जाओ, और ख़ुदा की शराब से मस्त हो जाओ।' 27 शेर
  19. 019 بخش ۱۹ - در آمدن ضریر در خانهٔ مصطفی علیه‌السلام و گریختن عایشه رضی الله عنها از پیش ضریر و گفتن رسول علیه‌السلام کی چه می‌گریزی او ترا نمی‌بیند و جواب دادن عایشه رضی الله عنها رسول را صلی الله علیه و سلمरसूलुल्लाह (उन पर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के घर में एक अंधा व्यक्ति का आना और आइशा (उन पर अल्लाह राज़ी हो) का अंधे के सामने से भाग जाना और रसूलुल्लाह (उन पर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कहना कि 'तुम क्यों भाग रही हो, वह तुम्हें नहीं देखता' और आइशा (उन पर अल्लाह राज़ी हो) का रसूलुल्लाह (उन पर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को जवाब देना 16 शेर
  20. 020 بخش ۲۰ - امتحان کردن مصطفی علیه‌السلام عایشه را رضی الله عنها کی چه پنهان می‌شوی پنهان مشو که اعمی ترا نمی‌بیند تا پدید آید کی عایشه رضی الله عنها از ضمیر مصطفی علیه السلام واقف هست یا خود مقلد گفت ظاهرستमुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) को आज़माना कि 'तुम क्यों छिपती हो, मत छिपो, क्योंकि अंधा तुम्हें नहीं देखता' ताकि यह ज़ाहिर हो जाए कि आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़मीर से वाकिफ़ हैं या उन्होंने ही मुस्तक़िल तौर पर कहा है कि 'यह ज़ाहिर है' 17 शेर
  21. 021 بخش ۲۱ - حکایت آن مطرب کی در بزم امیر ترک این غزل آغاز کرد گلی یا سوسنی یا سرو یا ماهی نمی‌دانم ازین آشفتهٔ بی‌دل چه می‌خواهی نمی‌دانم و بانگ بر زدن ترک کی آن بگو کی می‌دانی و جواب مطرب امیر راउस गायक की कहानी जिसने तुर्क अमीर की महफ़िल में यह ग़ज़ल शुरू की कि 'तुम फूल हो या नरगिस हो या सरू हो या चाँद हो, मैं नहीं जानता। इस बेदिल आशिक़ से तुम क्या चाहते हो, मैं नहीं जानता।' और तुर्क का चिल्लाकर कहना कि 'वह बताओ जो तुम जानते हो' और गायक का अमीर को जवाब देना। 20 शेर
  22. 022 بخش ۲۲ - تفسیر قوله علیه‌السلام موتوا قبل ان تموتوا بمیر ای دوست پیش از مرگ اگر می زندگی خواهی کی ادریس از چنین مردن بهشتی گشت پیش از ماअलैहिस्सलाम के इस कथन की व्याख्या, 'मरने से पहले मर जाओ', 'ऐ दोस्त, अगर तुम जीवन चाहते हो तो मौत से पहले मर जाओ', क्योंकि इदरीस (अलैहिस्सलाम) ऐसी मौत से हम से पहले जन्नती बन गए थे 54 शेर
  23. 023 بخش ۲۳ - تشبیه مغفلی کی عمر ضایع کند و وقت مرگ در آن تنگاتنگ توبه و استغفار کردن گیرد به تعزیت داشتن شیعهٔ اهل حلب هر سالی در ایام عاشورا به دروازهٔ انطاکیه و رسیدن غریب شاعر از سفر و پرسیدن کی این غریو چه تعزیه استएक लापरवाह आदमी की उपमा जो अपनी उम्र बर्बाद करता है और मरने के समय उस तंग हालात में तौबा और इस्तग़फ़ार करने लगता है, जैसे हलबी शिया हर साल आशूरा के दिनों में अंताकिया के दरवाज़े पर मातम करते हैं और एक अजनबी कवि सफ़र से आकर पूछता है कि 'यह चीख-पुकार किस मातम की है' 16 शेर
  24. 024 بخش ۲۴ - نکته گفتن آن شاعر جهت طعن شیعه حلبउस कवि का हलबी शियाओं पर ताना कसने के लिए एक नुक्ता कहना 13 शेर
  25. 025 بخش ۲۵ - تمثیل مرد حریص نابیننده رزاقی حق را و خزاین و رحمت او را به موری کی در خرمن‌گاه بزرگ با دانهٔ گندم می‌کوشد و می‌جوشد و می‌لرزد و به تعجیل می‌کشد و سعت آن خرمن را نمی‌بیندحق کے رزاق اور اس کے خزانوں اور رحمت کو نہ دیکھنے والے لالچی آدمی کا مثال اس चींटी سے دینا جو بڑے گندم کے ढेर में गेहूं के दाने के साथ जूझ रही है, बेचैन है, कांप रही है और जल्दी-जल्दी उसे खींच रही है, और उस ढेर की विशालता को नहीं देख रही है 40 शेर
  26. 026 بخش ۲۶ - داستان آن شخص کی بر در سرایی نیم‌شب سحوری می‌زد همسایه او را گفت کی آخر نیم‌شبست سحر نیست و دیگر آنک درین سرا کسی نیست بهر کی می‌زنی و جواب گفتن مطرب او راउस व्यक्ति की कहानी जिसने आधी रात को सेहरी बजाई। उसके पड़ोसी ने उससे कहा कि 'आधी रात है, सेहरी नहीं है, और दूसरी बात यह कि इस घर में कोई नहीं है, तुम किसके लिए बजा रहे हो' और गायक का उसे जवाब देना। 42 शेर
  27. 027 بخش ۲۷ - قصهٔ احد احد گفتن بلال در حر حجاز از محبت مصطفی علیه‌السلام در آن چاشتگاهها کی خواجه‌اش از تعصب جهودی به شاخ خارش می‌زد پیش آفتاب حجاز و از زخم خون از تن بلال برمی‌جوشید ازو احد احد می‌جست بی‌قصد او چنانک از دردمندان دیگر ناله جهد بی‌قصد زیرا از درد عشق ممتلی بود اهتمام دفع درد خار را مدخل نبود هم‌چون سحرهٔ فرعون و جرجیس و غیر هم لایعد و لا یحصیविलाल का हिजाज़ की धूप में 'अहद अहद' कहना रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की मोहब्बत में, उन सुबहों में जब उसका यहूदी आका बुतपरस्ती के कारण उसे हिजाज़ की धूप में कंटीली टहनी से मारता था, और विलाल के बदन से खून उबलता था, और उससे बेइरादा 'अहद अहद' निकलता था, जैसे दूसरे दर्दनाक लोगों से बेइरादा आहें निकलती हैं, क्योंकि वह इश्क़ के दर्द से भरा हुआ था, उसे कांटे के दर्द को दूर करने का कोई ध्यान नहीं था, जैसे फ़िरौन के जादूगर और ज़रजिस और अन्य, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। 65 शेर
  28. 028 بخش ۲۸ - باز گردانیدن صدیق رضی الله عنه واقعهٔ بلال را رضی الله عنه و ظلم جهودان را بر وی و احد احد گفتن او و افزون شدن کینهٔ جهودان و قصه کردن آن قضیه پیش مصطفی علیه‌السلام و مشورت در خریدن اوसिद्दीक़ (उन पर अल्लाह राज़ी हो) का बिलाल (उन पर अल्लाह राज़ी हो) की घटना और यहूदियों के उस पर किए गए ज़ुल्म और उसके 'अहद अहद' कहने को दोहराना, और यहूदियों की दुश्मनी का बढ़ जाना, और उस घटना को मुस्तफ़ा (उन पर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने बयान करना और उसे खरीदने के बारे में मशवरा करना 36 शेर
  29. 029 بخش ۲۹ - وصیت کردن مصطفی علیه‌السلام صدیق را رضی الله عنه کی چون بلال را مشتری می‌شوی هر آینه ایشان از ستیز بر خواهند در بها فزود و بهای او را خواهند فزودن مرا درین فضیلت شریک خود کن وکیل من باش و نیم بها از من بستانरसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) को वसीयत करना कि 'जब तुम बिलाल को खरीदो तो वे ज़रूर दाम बढ़ाने के लिए झगड़ा करेंगे और उसकी कीमत बढ़ा देंगे, मुझे इस फ़ज़ीलत में अपना शरीक कर लो, मेरे वकील बनो और आधी कीमत मुझसे ले लो' 45 शेर
  30. 030 بخش ۳۰ - خندیدن جهود و پنداشتن کی صدیق مغبونست درین عقدयहूदी का हँसना और यह सोचना कि सिद्दीक़ इस सौदे में घाटे में है 41 शेर
  31. 031 بخش ۳۱ - معاتبهٔ مصطفی علیه‌السلام با صدیق رضی الله عنه کی ترا وصیت کردم کی به شرکت من بخر تو چرا بهر خود تنها خریدی و عذر اوरसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) से नाराज़गी जताना कि 'मैंने तुम्हें अपनी साझेदारी में खरीदने की वसीयत की थी, तुमने अकेले अपने लिए क्यों खरीदा' और उनका बहाना 36 शेर
  32. 032 بخش ۳۲ - قصهٔ هلال کی بندهٔ مخلص بود خدای را صاحب بصیرت بی‌تقلید پنهان شده در بندگی مخلوقان جهت مصلحت نه از عجز چنانک لقمان و یوسف از روی ظاهر و غیر ایشان بندهٔ سایس بود امیری را و آن امیر مسلمان بود اما چشم بسته داند اعمی که مادری دارد لیک چونی بوهم در نارد اگر با این دانش تعظیم این مادر کند ممکن بود کی از عمی خلاص یابد کی اذا اراد الله به عبد خیرا فتح عینی قلبه لیبصره بهما الغیب این راه ز زندگی دل حاصل کن کین زندگی تن صفت حیوانستहिलाल की कहानी, जो अल्लाह का एक सच्चा बंदा था, बिना किसी नक़ल के अंतर्दृष्टि वाला, लोगों की बंदगी में छिपे हुए था किसी मक़सद से, लाचारी से नहीं, जैसे लोकमान और यूसुफ़ ज़ाहिरी तौर पर थे और उनके अलावा, वह एक अमीर का साईस था और वह अमीर मुसलमान था लेकिन उसकी आँखें बंद थीं, अंधा जानता है कि उसकी माँ है लेकिन उसे समझ में नहीं आता कि वह कैसी है, अगर वह इस ज्ञान के साथ इस माँ का सम्मान करे तो संभव है कि वह अंधेपन से मुक्ति पा ले, क्योंकि 'जब अल्लाह किसी बंदे का भला चाहता है तो उसके दिल की आँखें खोल देता है ताकि वह उनसे ग़ैब को देख सके'। यह रास्ता दिल के जीवन से हासिल करो, क्योंकि यह शरीर का जीवन जानवर की सिफ़त है। 7 शेर
  33. 033 بخش ۳۳ - حکایت در تقریر همین سخنइसी बात के समर्थन में एक कहानी 13 शेर
  34. 034 بخش ۳۴ - مثلउदाहरण 18 शेर
  35. 035 بخش ۳۵ - رنجور شدن این هلال و بی‌خبری خواجهٔ او از رنجوری او از تحقیر و ناشناخت و واقف شدن دل مصطفی علیه‌السلام از رنجوری و حال او و افتقاد و عیادت رسول علیه‌السلام این هلال راइस हिलाल का बीमार होना और उसके मालिक का उसके बीमार होने से बेख़बर रहना, अपमान और नासमझ के कारण, और मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दिल का उसकी बीमारी और हालत से वाकिफ़ होना, और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का इस हिलाल की देख-रेख और इयादत करना। 23 शेर
  36. 036 بخش ۳۶ - در آمدن مصطفی علیه‌السلام از بهر عیادت هلال در ستورگاه آن امیر و نواختن مصطفی هلال را رضی الله عنهमुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का हिलाल की इयादत के लिए उस अमीर के अस्तबल में आना और मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का हिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) का सम्मान करना 13 शेर
  37. 037 بخش ۳۷ - در بیان آنک مصطفی علیه‌السلام شنید کی عیسی علیه‌السلام بر روی آب رفت فرمود لو ازداد یقینه لمشی علی الهواءइस बात का बयान कि मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सुना कि ईसा (अलैहिस्सलाम) पानी पर चले, तो फ़रमाया 'अगर उनका यक़ीन और बढ़ जाता तो वे हवा पर चलते' 36 शेर
  38. 038 بخش ۳۸ - داستان آن عجوزه کی روی زشت خویشتن را جندره و گلگونه می‌ساخت و ساخته نمی‌شد و پذیرا نمی‌آمدउस बूढ़ी औरत की कहानी जो अपने बदसूरत चेहरे को चंदन और गुलाबजल से सजा रही थी, पर वह बन नहीं रहा था और स्वीकार नहीं हो रहा था 15 शेर
  39. 039 بخش ۳۹ - داستان آن درویش کی آن گیلانی را دعا کرد کی خدا ترا به سلامت به خان و مان باز رسانادउस दरवेश की कहानी जिसने उस गिलानी के लिए दुआ की कि 'ख़ुदा तुम्हें सलामती के साथ तुम्हारे घर और परिवार तक पहुँचाए' 5 शेर
  40. 040 بخش ۴۰ - صفت آن عجوزउस बूढ़ी औरत का वर्णन 8 शेर
  41. 041 بخش ۴۱ - قصهٔ درویشی کی از آن خانه هرچه می‌خواست می‌گفت نیستउस दरवेश की कहानी जिसने उस घर से जो कुछ माँगा, उसने 'नहीं है' कहा 18 शेर
  42. 042 بخش ۴۲ - رجوع به داستان آن کمپیرउस बुढ़िया की कहानी पर वापस आना 25 शेर
  43. 043 بخش ۴۳ - حکایت آن رنجور کی طبیب درو اومید صحت ندیدउस बीमार व्यक्ति की कहानी जिसमें डॉक्टर को ठीक होने की उम्मीद नहीं दिखी 28 शेर
  44. 044 بخش ۴۴ - رجوع به قصهٔ رنجورबीमार की कहानी पर लौटना 62 शेर
  45. 045 بخش ۴۵ - قصهٔ سلطان محمود و غلام هندوसुल्तान महमूद और हिंदू गुलाम की कहानी 67 शेर
  46. 046 بخش ۴۶ - لیس للماضین هم الموت انما لهم حسرة الفوتगुज़रे हुए लोगों के लिए मौत का ग़म नहीं होता, बल्कि उनके लिए बस खो जाने का अफ़सोस होता है। 33 शेर
  47. 047 بخش ۴۷ - بار دیگر رجوع کردن به قصهٔ صوفی و قاضیएक बार फिर सूफ़ी और क़ाज़ी की कहानी पर लौटना 85 शेर
  48. 048 بخش ۴۸ - طیره شدن قاضی از سیلی درویش و سرزنش کردن صوفی قاضی راदरवेश के थप्पड़ से क़ाज़ी का नाराज़ होना और सूफ़ी का क़ाज़ी को डांटना 9 शेर
  49. 049 بخش ۴۹ - جواب دادن قاضی صوفی راक़ाज़ी का सूफ़ी को जवाब देना 27 शेर
  50. 050 بخش ۵۰ - سؤال کردن آن صوفی قاضی راउस सूफ़ी का क़ाज़ी से सवाल करना 9 शेर
  51. 051 بخش ۵۱ - جواب گفتن آن قاضی صوفی راउस क़ाज़ी का सूफ़ी को जवाब देना 32 शेर
  52. 052 بخش ۵۲ - باز سؤال کردن صوفی از آن قاضیसूफ़ी का उस क़ाज़ी से फिर से सवाल करना 5 शेर
  53. 053 بخش ۵۳ - جواب قاضی سؤال صوفی را و قصهٔ ترک و درزی را مثل آوردنक़ाज़ी का सूफ़ी के सवाल का जवाब देना और तुर्क और दर्ज़ी की कहानी को मिसाल के तौर पर लाना 6 शेर
  54. 054 بخش ۵۴ - قال النبی علیه السلام ان الله تعالی یلقن الحکمة علی لسان الواعظین بقدر همم المستمعینनबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि 'निश्चय ही अल्लाह त'आला वा'इज़ों की ज़बान पर सुनने वालों की हिम्मत के अनुसार हिकमत डालता है' 17 शेर
  55. 055 بخش ۵۵ - دعوی کردن ترک و گرو بستن او کی درزی از من چیزی نتواند بردنतुर्क का दावा करना और शर्त लगाना कि दर्ज़ी उससे कुछ नहीं ले जा पाएगा 20 शेर
  56. 056 بخش ۵۶ - مضاحک گفتن درزی و ترک را از قوت خنده بسته شدن دو چشم تنگ او و فرصت یافتن درزیदर्जी का मज़ाक़िया बातें कहना और तुर्क की हँसी की तेज़ी से उसकी दोनों पतली आँखें बंद हो जाना और दर्जी को मौक़ा मिल जाना 24 शेर
  57. 057 بخش ۵۷ - گفتن درزی ترک را هی خاموش کی اگر مضاحک دگر گویم قبات تنگ آیدदर्ज़ी का तुर्क से कहना कि 'ख़ामोश हो जाओ, अगर मैंने और मज़ाक़िया बातें कहीं तो तुम्हारा गला तंग हो जाएगा' 3 शेर
  58. 058 بخش ۵۸ - بیان آنک بی‌کاران و افسانه‌جویان مثل آن ترک‌اند و عالم غرار غدار هم‌چو آن درزی و شهوات و زبان مضاحک گفتن این دنیاست و عمر هم‌چون آن اطلس پیش این درزی جهت قبای بقا و لباس تقوی ساختنयह बयान करना कि बेक़ार और अफ़साने गढ़ने वाले उस तुर्क की तरह हैं और धोखेबाज दुनिया उस दर्ज़ी की तरह है, और शहवात और ज़बान इस दुनिया की मज़ाक़िया बातें हैं, और उम्र उस एटलस की तरह है जो उस दर्ज़ी के सामने है ताकि बक़ा का लिबास और तक़वा का लिबास बनाया जा सके 7 शेर
  59. 059 بخش ۵۹ - مثلउदाहरण 12 शेर
  60. 060 بخش ۶۰ - باز مکرر کردن صوفی سؤال راसूफ़ी का सवाल को फिर से दोहराना 8 शेर
  61. 061 بخش ۶۱ - جواب دادن قاضی صوفی راक़ाज़ी का सूफ़ी को जवाब देना 11 शेर
  62. 062 بخش ۶۲ - حکایت در تقریر آنک صبر در رنج کار سهل‌تر از صبر در فراق یار بودइस बात के समर्थन में एक कहानी कि दुख में सब्र करना दोस्त के बिछड़ने के सब्र से ज़्यादा आसान होता है 22 शेर
  63. 063 بخش ۶۳ - مثلउदाहरण 54 शेर
  64. 064 بخش ۶۴ - باقی قصهٔ فقیر روزی‌طلب بی‌واسطهٔ کسبकमाई के साधन के बिना रोज़मर्रा की ज़िंदगी गुज़ारने वाले उस फ़कीर की बाक़ी कहानी 74 शेर
  65. 065 بخش ۶۵ - قصهٔ آن گنج‌نامه کی پهلوی قبه‌ای روی به قبله کن و تیر در کمان نه بینداز آنجا کی افتد گنجستउस ख़ज़ाने की चिट्ठी की कहानी कि 'एक गुंबद के पास क़िब्ले की तरफ़ मुँह करके तीर कमान में रखो और फेंको, जहाँ गिरे वहीं ख़ज़ाना है' 31 शेर
  66. 066 بخش ۶۶ - تمامی قصهٔ آن فقیر و نشان جای آن گنجउस फ़कीर की कहानी और उस ख़ज़ाने की जगह का निशान पूरा करना 9 शेर
  67. 067 بخش ۶۷ - فاش شدن خبر این گنج و رسیدن به گوش پادشاهइस ख़ज़ाने की ख़बर का फैलना और बादशाह के कानों तक पहुँचना 11 शेर
  68. 068 بخش ۶۸ - نومید شدن آن پادشاه از یافتن آن گنج و ملول شدن او از طلب آنउस बादशाह का उस ख़ज़ाने को पाने से निराश होना और उसे तलाश करने से उकता जाना 16 शेर
  69. 069 بخش ۶۹ - باز دادن شاه گنج‌نامه را به آن فقیر کی بگیر ما از سر این برخاستیمराजा द्वारा उस फ़कीर को खज़ाने का नक्शा वापस करना कि ले लो, हमने इससे हाथ खींच लिए 69 शेर
  70. 070 بخش ۷۰ - حکایت مرید شیخ حسن خرقانی قدس الله سرهशेख़ हसन ख़रक़ानी (क़ुद्दिसल्लाहु सिर्रुहू) के मुरीद की कहानी 12 शेर
  71. 071 بخش ۷۱ - پرسیدن آن وارد از حرم شیخ کی شیخ کجاست کجا جوییم و جواب نافرجام گفتن حرمउस आगंतुक का शेख़ के हरम से पूछना कि शेख़ कहाँ हैं, उन्हें कहाँ ढूँढें, और हरम का अधूरा उत्तर देना 12 शेर
  72. 072 بخش ۷۲ - جواب گفتن مرید و زجر کردن مرید آن طعانه را از کفر و بیهوده گفتنमुरीद का उत्तर देना और उस ताना देने वाले को कुफ़्र और व्यर्थ बात करने के लिए डांटना 47 शेर
  73. 073 بخش ۷۳ - واگشتن مرید از وثاق شیخ و پرسیدن از مردم و نشان دادن ایشان کی شیخ به فلان بیشه رفته استमुरीद का शेख़ के निवास से वापस लौटना और लोगों से पूछना, और उनका यह बताना कि शेख़ फलां जंगल में गए हैं 11 शेर
  74. 074 بخش ۷۴ - یافتن مرید مراد را و ملاقات او با شیخ نزدیک آن بیشهमुरीद का अपनी मुराद को पाना और उस जंगल के पास शेख़ से मिलना 27 शेर
  75. 075 بخش ۷۵ - حکمت در انی جاعل فی الارض خلیفة“अन्नी जा'इलुन फ़िल अर्दि ख़लीफ़तन” में निहित ज्ञान 38 शेर
  76. 076 بخش ۷۶ - معجزهٔ هود علیه‌السلام در تخلص مؤمنان امت به وقت نزول بادपैगंबर हूद अलैहिस्सलाम का चमत्कार, जब आँधी आई तो उनकी उम्मत के मोमिनों को बचाना 66 शेर
  77. 077 بخش ۷۷ - رجوع کردن به قصهٔ قبه و گنجगुंबद और ख़ज़ाने की कहानी पर लौटना 31 शेर
  78. 078 بخش ۷۸ - انابت آن طالب گنج به حق تعالی بعد از طلب بسیار و عجز و اضطرار کی ای ولی الاظهار تو کن این پنهان را آشکارउस ख़ज़ाने के खोजी का बहुत खोजने, लाचारी और मजबूरी के बाद अल्लाह से इनाबत करना कि हे ज़ाहिर करने वाले, इस छुपी हुई चीज़ को ज़ाहिर कर दे 59 शेर
  79. 079 بخش ۷۹ - آواز دادن هاتف مر طالب گنج را و اعلام کردن از حقیقت اسرار آنहातिफ़ का ख़ज़ाने के खोजी को आवाज़ देना और उसे उसके रहस्यों की हक़ीक़त से आगाह करना 29 शेर
  80. 080 بخش ۸۰ - حکایت آن سه مسافر مسلمان و ترسا و جهود و آن کی به منزل قوتی یافتند و ترسا و جهود سیر بودند گفتند این قوت را فردا خوریم مسلمان صایم بود گرسنه ماند از آنک مغلوب بودउन तीन यात्रियों (एक मुसलमान, एक ईसाई, और एक यहूदी) की कहानी, और उन्हें एक पड़ाव पर कुछ खाना मिला, ईसाई और यहूदी पेट भरे थे, उन्होंने कहा यह खाना कल खाएंगे, मुसलमान रोज़ेदार था, भूखा रह गया क्योंकि वह उन पर हावी नहीं था 81 शेर
  81. 081 بخش ۸۱ - حکایت اشتر و گاو و قج که در راه بند گیاه یافتند هر یکی می‌گفت من خورمऊँट, गाय और भेड़िये की कहानी जो रास्ते में घास पाए, हर कोई कहता मैं खाऊँगा 8 शेर
  82. 082 بخش ۸۲ - مثلउदाहरण 21 शेर
  83. 083 بخش ۸۳ - جواب گفتن مسلمان آنچ دید به یارانش جهود و ترسا و حسرت خوردن ایشانमुसलमान का अपने साथियों (यहूदी और ईसाई) को वह बताना जो उसने देखा, और उनका अफ़सोस करना 24 शेर
  84. 084 بخش ۸۴ - منادی کردن سید ملک ترمد کی هر کی در سه یا چهار روز به سمرقند رود به فلان مهم خلعت و اسپ و غلام و کنیزک و چندین زر دهم و شنیدن دلقک خبر این منادی در ده و آمدن به اولاقی نزد شاه کی من باری نتوانم رفتنसैयद मलिक टर्मेज़ का यह ऐलान करवाना कि जो कोई तीन या चार दिन में समरकंद जाएगा फलां महत्वपूर्ण काम के लिए उसे ख़िलअत, घोड़ा, गुलाम, लौंडी और इतना सोना दूँगा, और एक विदूषक का यह ऐलान सुनकर गाँव से एक हरकारे के पास राजा के पास आना कि मैं तो नहीं जा पाऊँगा 122 शेर
  85. 085 بخش ۸۵ - حکایت تعلق موش با چغز و بستن پای هر دو به رشته‌ای دراز و بر کشیدن زاغ موش را و معلق شدن چغز و نالیدن و پشیمانی او از تعلق با غیر جنس و با جنس خود ناساختنचूहे का कछुए से लगाव और दोनों के पैर एक लंबी रस्सी से बँधे होना, और कौवे का चूहे को उठा ले जाना, और कछुए का लटक जाना और रोना, और गैर-जातीय से लगाव और अपनी जाति से असामंजस्य के लिए उसका पछतावा 33 शेर
  86. 086 بخش ۸۶ - تدبیر کردن موش به چغز کی من نمی‌توانم بر تو آمدن به وقت حاجت در آب میان ما وصلتی باید کی چون من بر لب جو آیم ترا توانم خبر کردن و تو چون بر سر سوراخ موش‌خانه آیی مرا توانی خبر کردن الی آخرهचूहे का कछुए के साथ षड्यंत्र करना कि मैं ज़रूरत के वक्त तुझ पर नहीं आ सकता, पानी में हमारे बीच एक संबंध होना चाहिए कि जब मैं नदी के किनारे आऊँ तो तुझे खबर कर सकूँ, और जब तू चूहे के बिल के मुँह पर आए तो मुझे खबर कर सके, आदि 21 शेर
  87. 087 بخش ۸۷ - مبالغه کردن موش در لابه و زاری و وصلت جستن از چغز آبیचूहे का गिड़गिड़ाकर और रोकर पानी के कछुए से संबंध बनाना 29 शेर
  88. 088 بخش ۸۸ - لابه کردن موش مر چغز را کی بهانه میندیش و در نسیه مینداز انجاح این حاجت مرا کی فی التاخیر آفات و الصوفی ابن الوقت و ابن دست از دامن پدر باز ندارد و اب مشفق صوفی کی وقتست او را بنگرش به فردا محتاج نگرداند چندانش مستغرق دارد در گلزار سریع الحسابی خویش نه چون عوام منتظر مستقبل نباشد نهری باشد نه دهری کی لا صباح عند الله و لا مساء ماضی و مستقبل و ازل و ابد آنجا نباشد آدم سابق و دجال مسبوق نباشد کی این رسوم در خطهٔ عقل جز وی است و روح حیوانی در عالم لا مکان و لا زمان این رسوم نباشد پس او ابن وقتیست کی لا یفهم منه الا نفی تفرقة الا زمنة چنانک از الله واحد فهم شود نفی دوی نی حقیقت واحدیचूहे का कछुए से गिड़गिड़ाकर कहना कि बहाने मत सोचो और इस ज़रूरत को टालो मत, क्योंकि देरी में आफ़तें हैं, और सूफी 'इब्नुल वक्त' (समय का बेटा) है, और बेटा पिता का दामन नहीं छोड़ता, और दयालु पिता सूफी है जो उसे वक्त से बांधे रखता है, उसे कल का मोहताज नहीं करता, उसे अपनी शीघ्र गणना के गुलिस्तां में इतना डुबो देता है कि वह आम लोगों की तरह भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करता, वह एक नदी है न कि युग, क्योंकि अल्लाह के पास न सुबह है न शाम, अतीत और भविष्य, अज़ल और अबद वहाँ नहीं होते, आदम पहले और दज्जाल बाद में नहीं होता, क्योंकि ये सब 'अक्ल-ए-जुज़वी' (आंशिक बुद्धि) के दायरे में हैं, और 'आलम-ए-ला-मकान व ला-ज़मान' (बिना स्थान और बिना समय का संसार) में ये रस्में नहीं होतीं, तो वह 'इब्नुल वक्त' है जिससे केवल समयों के भेद का इन्कार समझा जाता है, जैसे 'अल्लाह वाहिद' से दो का इन्कार समझा जाता है, न कि एक की हक़ीक़त 101 शेर
  89. 089 بخش ۸۹ - حکایت شب دزدان کی سلطان محمود شب در میان ایشان افتاد کی من یکی‌ام از شما و بر احوال ایشان مطلع شدن الی آخرهरात के चोरों की कहानी कि सुलतान महमूद रात को उनके बीच पड़ गया कि मैं भी तुम में से एक हूँ, और उनकी हालत से वाक़िफ़ हुआ, आदि 105 शेर
  90. 090 بخش ۹۰ - قصهٔ آنک گاو بحری گوهر کاویان از قعر دریا بر آورد شب بر ساحل دریا نهد در درخش و تاب آن می‌چرد بازرگان از کمین برون آید چون گاو از گوهر دورتر رفته باشد بازرگان به لجم و گل تیره گوهر را بپوشاند و بر درخت گریزد الی آخر القصه و التقریبउस कहानी कि समुद्री गाय ‘गौहर-ए-कावियान’ समुद्र की गहराई से निकाल कर रात को समुद्र किनारे रखती है और उसकी चमक में चरती है, सौदागर घात लगाकर निकलता है, जब गाय गौहर से दूर चली जाती है तो सौदागर कीचड़ और गंदे पानी से गौहर को छुपा देता है और पेड़ पर चढ़ जाता है, आदि कहानी और उपमा 19 शेर
  91. 091 بخش ۹۱ - رجوع کردن به قصهٔ طلب کردن آن موش آن چغز را لب‌لب جو و کشیدن سر رشته تا چغز را در آب خبر شود از طلب اوउस चूहे की कहानी पर लौटना जो कछुए को नदी के किनारे बुलाता है, और रस्सी का सिरा खींचना ताकि कछुए को पानी में उसके बुलावे का पता चले 33 शेर
  92. 092 بخش ۹۲ - قصهٔ عبدالغوث و ربودن پریان او را و سالها میان پریان ساکن شدن او و بعد از سالها آمدن او به شهر و فرزندان خویش را باز ناشکیفتن او از آن پریان به حکم جنسیت و همدلی او با ایشانअब्दुल-ग़ौस की कहानी और परियों द्वारा उसका अपहरण, और उसका कई सालों तक परियों के बीच रहना, और कई सालों बाद शहर लौटना और अपने बच्चों को उन परियों के कारण न सह पाना, अपनी जाति और हमदर्दी के हुक्म से 40 शेर
  93. 093 بخش ۹۳ - داستان آن مرد کی وظیفه داشت از محتسب تبریز و وامها کرده بود بر امید آن وظیفه و او را خبر نه از وفات او حاصل از هیچ زنده‌ای وام او گزارده نشد الا از محتسب متوفی گزارده شد چنانک گفته‌اند لیس من مات فاستراح بمیت انما المیت میت الاحیاءउस आदमी की कहानी जिसे तबरेज़ के मुहतसिब से एक वज़ीफ़ा मिलता था और उसने उस वज़ीफ़े की उम्मीद पर कर्ज लिया था, और उसे उसकी वफ़ात की खबर नहीं थी; संक्षेप में, कोई भी जीवित व्यक्ति उसका कर्ज नहीं चुका सका सिवाय मृतक मुहतसिब के, जैसा कि कहा गया है: 'लेस मन मात फ़स्तराह बिमय्यित इन्नामा अल-मय्यित मय्यितुल अहयाअ' (जो मरकर आराम करता है वह मरा नहीं, मरा हुआ वह है जो जीवितों में हो) 15 शेर
  94. 094 بخش ۹۴ - آمدن جعفر رضی الله عنه به گرفتن قلعه به تنهایی و مشورت کردن ملک آن قلعه در دفع او و گفتن آن وزیر ملک را کی زنهار تسلیم کن و از جهل تهور مکن کی این مرد میدست و از حق جمعیت عظیم دارد در جان خویش الی آخرهजाफ़र रज़ियल्लाहु अन्हु का अकेले किला जीतने आना, और किले के राजा का उसे रोकने की सलाह करना, और उस मंत्री का राजा से कहना कि ख़बरदार! समर्पण कर दो और अज्ञानता से साहस मत करो, क्योंकि यह आदमी मर्द है और उसके दिल में अल्लाह की बहुत बड़ी जमात है, आदि 77 शेर
  95. 095 بخش ۹۵ - رجوع کردن به حکایت آن شخص وام کرده و آمدن او به امید عنایت آن محتسب سوی تبریزउस कर्जदार आदमी की कहानी पर लौटना और उस मुहतसिब की कृपा की उम्मीद में तबरेज़ आना 18 शेर
  96. 096 بخش ۹۶ - باخبر شدن آن غریب از وفات آن محتسب و استغفار او از اعتماد بر مخلوق و تعویل بر عطای مخلوق و یاد نعمتهای حق کردنش و انابت به حق از جرم خود ثُمَّ الَّذینَ کَفَروا بِرَبِّهِمْ یَعْدِلونَउस अजनबी को मुहतसिब की वफ़ात की खबर मिलना, और مخلوक़ पर भरोसा करने और مخلوक़ की अता पर निर्भर रहने से इस्तग़फ़ार करना, और अल्लाह की नेमतों को याद करना, और अपने गुनाह से अल्लाह से इनाबत करना: "ثم الذين كفروا بربهم يعدلون" (फिर वे लोग जो अपने रब के साथ कुफ्र करते हैं, वे बराबरी करते हैं) 96 शेर
  97. 097 بخش ۹۷ - مثل دوبین هم‌چو آن غریب شهر کاش عمر نام کی از یک دکانش به سبب این به آن دکان دیگر حواله کرد و او فهم نکرد کی همه دکان یکیست درین معنی کی به عمر نان نفروشند هم اینجا تدارک کنم من غلط کردم نامم عمر نیست چون بدین دکان توبه و تدارک کنم نان یابم از همه دکان‌های این شهر و اگر بی‌تدارک هم‌چنین عمر نام باشم ازین دکان در گذرم محرومم و احولم و این دکان‌ها را از هم جدا دانسته‌امदुगनी दृष्टि वाले का उदाहरण उस शहर के अजनबी की तरह है जिसका नाम 'उमर' था कि एक दुकान से उसे इस वजह से दूसरी दुकान पर भेजा गया और वह नहीं समझा कि सारी दुकानें एक ही हैं इस अर्थ में कि 'उमर' को रोटी नहीं बेचते, यहीं सुधार करूँगा, मैंने गलती की, मेरा नाम 'उमर' नहीं है, जब मैं इस दुकान पर तौबा और सुधार करूँगा तो इस शहर की सभी दुकानों से रोटी पाऊँगा, और अगर बिना सुधार के मैं इसी तरह 'उमर' नाम का रहा तो मैं इस दुकान से भी महरूम रहूँगा, मैं अँधा हूँ और इन दुकानों को एक दूसरे से अलग समझा है 28 शेर
  98. 098 بخش ۹۸ - توزیع کردن پای‌مرد در جملهٔ شهر تبریز و جمع شدن اندک چیز و رفتن آن غریب به تربت محتسب به زیارت و این قصه را بر سر گور او گفتن به طریق نوحه الی آخرهबीच बचाव करने वाले का तबरेज़ शहर में घूमना और थोड़ी सी चीज़ जमा करना, और उस अजनबी का मुहतसिब की क़ब्र पर ज़ियारत के लिए जाना और इस कहानी को उसकी क़ब्र पर नौहे के अंदाज़ में कहना, आदि 97 शेर
  99. 099 بخش ۹۹ - دیدن خوارزمشاه رحمه الله در سیران در موکب خود اسپی بس نادر و تعلق دل شاه به حسن و چستی آن اسپ و سرد کردن عمادالملک آن اسپ را در دل شاه و گزیدن شاه گفت او را بر دید خویش چنانک حکیم رحمة الله علیه در الهی‌نامه فرمود چون زبان حسد شود نخاس یوسفی یابی از گزی کرباس از دلالی برادران یوسف حسودانه در دل مشتریان آن چندان حسن پوشیده شد و زشت نمودن گرفت کی وَ کانوا فیهِ مِنَ الزّاهِدینَख़्वारज़्मशाह रहमतुल्लाह अलैह का अपने जुलूस में एक बहुत ही दुर्लभ घोड़ा देखना और शाह के दिल का उस घोड़े की सुंदरता और फुर्ती से लगाव होना, और इमादुलमुल्क का उस घोड़े को शाह के दिल में ठंडा कर देना, और शाह का उसे अपने देखने पर वरीयता देना, जैसा कि हकीम रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी इलाहीनामा में फ़रमाया है: “जब ज़बान हसद हो जाए, तो यूसुफ़ को खस की तरह गज़ से खरीदोगे,” भाइयों की दलाली से हसद की वजह से ग्राहक के दिल में इतनी खूबसूरती छिप गई और बदसूरत दिखने लगी कि “और वे उसमें से ज़ाहिद थे” 55 शेर
  100. 100 بخش ۱۰۰ - ماخذهٔ یوسف صدیق صلوات‌الله علیه به حبس بضع سنین به سبب یاری خواستن از غیر حق و گفتن اذکرنی عند ربک مع تقریرهयूसुफ़ सिद्दीक़ सलावतल्लाह अलैह पर कुछ साल जेल में रहने की गिरफ़्त, अल्लाह के अलावा किसी और से मदद मांगने के कारण, और उनका कहना “मेरे रब के पास मेरा ज़िक्र करना,” उनके बयान के साथ 118 शेर
  101. 101 بخش ۱۰۱ - رجوع کردن به قصهٔ آن پای‌مرد و آن غریب وام‌دار و بازگشتن ایشان از سر گور خواجه و خواب دیدن پای‌مرد خواجه را الی آخرهउस बीच-बचाव करने वाले और उस कर्जदार अजनबी की कहानी पर लौटना, और उनका ख़्वाजा की क़ब्र से वापस लौटना, और बीच-बचाव करने वाले का ख़्वाजा को सपने में देखना, आदि 15 शेर
  102. 102 بخش ۱۰۲ - گفتن خواجه در خواب به آن پای‌مرد وجوه وام آن دوست را کی آمده بود و نشان دادن جای دفن آن سیم و پیغام کردن به وارثان کی البته آن را بسیار نبینند وهیچ باز نگیرند و اگر چه او هیچ از آن قبول نکند یا بعضی را قبول نکند هم آنجا بگذارند تا هر آنک خواهد برگیرد کی من با خدا نذرها کردم کی از آن سیم به من و به متعلقان من حبه‌ای باز نگردد الی آخرهख़्वाजा का सपने में उस बीच-बचाव करने वाले को दोस्त के कर्ज के तरीके बताना जो आया था, और उस चांदी के दफ़्न की जगह बताना, और वारिसों को पैगाम देना कि उसे हरगिज़ बहुत न देखें और कुछ भी वापस न लें, और अगर वह कुछ भी कुबूल न करे या कुछ कुबूल न करे तो वहीं छोड़ दें ताकि जो चाहे ले ले, क्योंकि मैंने अल्लाह से क़समें खाई हैं कि उस चांदी में से एक हब्बा भी मुझ तक और मेरे संबंधियों तक वापस नहीं आएगा, आदि 50 शेर
  103. 103 بخش ۱۰۳ - حکایت آن پادشاه و وصیت کردن او سه پسر خویش را کی درین سفر در ممالک من فلان جا چنین ترتیب نهید و فلان جا چنین نواب نصب کنید اما الله الله به فلان قلعه مروید و گرد آن مگردیدउस बादशाह की कहानी और उसकी अपने तीन बेटों को वसीयत करना कि इस यात्रा में मेरे राज्यों में फलां जगह ऐसा इंतज़ाम करो और फलां जगह ऐसे नायब नियुक्त करो, लेकिन अल्लाह अल्लाह! फलां किले में मत जाना और उसके पास भी मत भटकना 13 शेर
  104. 104 بخش ۱۰۴ - بیان استمداد عارف از سرچشمهٔ حیات ابدی و مستغنی شدن او از استمداد و اجتذاب از چشمه‌های آبهای بی‌وفا کی علامة ذالک التجافی عن دار الغرور کی آدمی چون بر مددهای آن چشمه‌ها اعتماد کند در طلب چشمهٔ باقی دایم سست شود کاریز درون جان تو می‌باید کز عاریه‌ها ترا دری نگشاید یک چشمهٔ آب از درون خانه به زان جویی که آن ز بیرون آیدआत्मा के अमर जीवन के स्रोत से अरीफ़ की मदद की अभिव्यक्ति और बेवफा पानी के स्रोतों से मदद और आकर्षण से उसका बेनियाज़ हो जाना, जिसकी निशानी 'दारुल-ग़ुरूर' (धोखे का घर) से अलग होना है, क्योंकि जब आदमी उन स्रोतों की मदद पर भरोसा करता है तो स्थायी स्रोत की तलाश में हमेशा ढीला पड़ जाता है। तुम्हें अपनी आत्मा के अंदर की नहर चाहिए, जो उधार के दरवाज़े न खोले। घर के अंदर के पानी का एक चश्मा, बाहर से आने वाली नहर से बेहतर है 34 शेर
  105. 105 بخش ۱۰۵ - روان شدن شه‌زادگان در ممالک پدر بعد از وداع کردن ایشان شاه را و اعادت کردن شاه وقت وداع وصیت را الی آخرهशाहजादों का शाह को अलविदा कहने के बाद पिता के राज्यों में जाना, और शाह का अलविदा कहते समय वसीयत को दोहराना, आदि 69 शेर
  106. 106 بخش ۱۰۶ - رفتن پسران سلطان به حکم آنک الانسان حریص علی ما منع ما بندگی خویش نمودیم ولیکن خوی بد تو بنده ندانست خریدن به سوی آن قلعهٔ ممنوع عنه آن همه وصیت‌ها و اندرزهای پدر را زیر پا نهادند تا در چاه بلا افتادند و می‌گفتند ایشان را نفوس لوامه الم یاتکم نذیر ایشان می‌گفتند گریان و پشیمان لوکنا نسمع او نعقل ماکنا فی اصحاب السعیرसुल्तान के बेटों का इस हुक्म के तहत जाना कि “इंसान उन चीज़ों का लालची होता है जिनसे उसे मना किया जाता है,” “हमने अपनी बंदगी दिखाई, लेकिन तुम्हारे बुरे स्वभाव ने बंदगी खरीदना नहीं सीखा,” उस मना किए हुए किले की ओर जाना, पिता की सभी वसीयतों और नसीहतों को पैरों तले रौंद दिया ताकि मुसीबत के कुएँ में गिर जाएँ, और उन्हें उनकी 'नफ़्स-ए-लव्वामा' (आत्म-भर्त्सना करने वाली आत्मा) कहती थी: “क्या तुम्हारे पास कोई डरने वाला नहीं आया?” वे रोते और पछताते हुए कहते थे: “अगर हम सुनते या समझते तो जहन्नम वालों में से न होते” 61 शेर
  107. 107 بخش ۱۰۷ - دیدن ایشان در قصر این قلعهٔ ذات الصور نقش روی دختر شاه چین را و بیهوش شدن هر سه و در فتنه افتادن و تفحص کردن کی این صورت کیستउन्हें इस किले के महल में चीन के राजा की बेटी की तस्वीर देखना, और तीनों का बेहोश हो जाना, और फितने में पड़ना, और यह छानबीन करना कि यह तस्वीर किसकी है 39 शेर
  108. 108 بخش ۱۰۸ - حکایت صدر جهان بخارا کی هر سایلی کی به زبان بخواستی از صدقهٔ عام بی‌دریغ او محروم شدی و آن دانشمند درویش به فراموشی و فرط حرص و تعجیل به زبان بخواست در موکب صدر جهان از وی رو بگردانید و او هر روز حیلهٔ نو ساختی و خود را گاه زن کردی زیر چادر وگاه نابینا کردی و چشم و روی خود بسته به فراستش بشناختی الی آخرهबुखारा के सदर-ए-जहाँ की कहानी कि जो भी मांगने वाला ज़ुबान से आम सदक़ा मांगता, वह उसकी बेशुमार अता से महरूम रहता, और एक विद्वान दरवेश ने भूलवश और अत्यधिक लालच और जल्दबाजी में सदर-ए-जहाँ के जुलूस में ज़ुबान से मांगा, तो उसने उससे मुँह मोड़ लिया, और वह हर दिन एक नई तरकीब बनाता और कभी खुद को चादर के नीचे औरत बना लेता और कभी अंधा बना लेता और अपनी आँखों और चेहरे को ढँक लेता, फिर भी वह उसे अपनी फ़रासत से पहचान लेता, आदि 44 शेर
  109. 109 بخش ۱۰۹ - حکایت آن دو برادر یکی کوسه و یکی امرد در عزب خانه‌ای خفتند شبی اتفاقا امرد خشت‌ها بر مقعد خود انبار کرد عاقبت دباب دب آورد و آن خشت‌ها را به حیله و نرمی از پس او برداشت کودک بیدار شد به جنگ کی این خشت‌ها کو کجا بردی و چرا بردی او گفت تو این خشت‌ها را چرا نهادی الی آخرهउन दो भाइयों की कहानी, एक दाढ़ी रहित और दूसरा बिना दाढ़ी वाला, एक रात अकेले कमरे में सोए, इत्तेफ़ाक से बिना दाढ़ी वाले ने अपने नितंबों पर ईंटें जमा कर लीं, अंत में एक छिपकली आई और उन ईंटों को चालाकी और नरमी से उसके पीछे से हटा दिया, लड़का जाग गया और लड़ने लगा कि ये ईंटें कहाँ ले गए और क्यों ले गए, उसने कहा तुमने ये ईंटें क्यों रखी थीं, आदि 41 शेर
  110. 110 بخش ۱۱۰ - در تفسیر این خبر کی مصطفی صلوات‌الله علیه فرمود منهومان لا یشبعان طالب الدنیا و طالب العلم کی این علم غیر علم دنیا باید تا دو قسم باشد اما علم دنیا هم دنیا باشد الی آخره و اگر هم‌چنین شود کی طالب الدنیا و طالب الدنیا تکرار بود نه تقسیم مع تقریرهइस खबर की तफ़सीर में कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: “दो लालची कभी سیر نہیں ہوتے، दुनिया का तलबगार और इल्म का तलबगार,” कि यह इल्म दुनिया के इल्म से अलग होना चाहिए ताकि दो क़िस्म हो, लेकिन दुनिया का इल्म भी दुनिया ही होगा, आदि। और अगर ऐसा ही हो कि “तालिब-ए-दुनिया व तालिब-ए-दुनिया” तकरार होगी न कि तकसीम, उसके बयान के साथ 3 शेर
  111. 111 بخش ۱۱۱ - بحث کردن آن سه شه‌زاده در تدبیر آن واقعهउन तीन शाहज़ादों का उस घटना पर विचार-विमर्श करना 5 शेर
  112. 112 بخش ۱۱۲ - مقالت برادر بزرگینबड़े भाई का कथन 22 शेर
  113. 113 بخش ۱۱۳ - ذکر آن پادشاه که آن دانشمند را به اکراه در مجلس آورد و بنشاند ساقی شراب بر دانشمند عرضه کرد ساغر پیش او داشت رو بگردانید و ترشی و تندی آغاز کرد شاه ساقی را گفت کی هین در طبعش آر ساقی چندی بر سرش کوفت و شرابش در خورد داد الی آخرهउस बादशाह का ज़िक्र जिसने उस विद्वान को जबरदस्ती मजलिस में बुलाया और बैठाया, साकी ने विद्वान को शराब पेश की, उसके सामने प्याला रखा तो उसने मुँह मोड़ लिया और खट्टापन और सख्ती शुरू कर दी, शाह ने साकी से कहा कि “अरे! उसे उसके स्वभाव में ले आओ।” साकी ने कई बार उसके सिर पर मारा और उसे शराब पिलाई, आदि 66 शेर
  114. 114 بخش ۱۱۴ - روان گشتن شاه‌زادگان بعد از تمام بحث و ماجرا به جانب ولایت چین سوی معشوق و مقصود تا به قدر امکان به مقصود نزدیک‌تر باشند اگر چه راه وصل مسدودست به قدر امکان نزدیک‌تر شدن محمودست الی آخرهशाहज़ादों का पूरी बहस और वाद-विवाद के बाद चीन देश की ओर अपने महबूब और मक़सूद की तरफ़ रवाना होना, ताकि जहाँ तक मुमकिन हो, मक़सूद के करीब हों, हालाँकि मिलने का रास्ता बंद है, मुमकिन हद तक करीब होना महमूद है, आदि 6 शेर
  115. 115 بخش ۱۱۵ - حکایت امرء القیس کی پادشاه عرب بود و به صورت عظیم به جمال بود یوسف وقت خود بود و زنان عرب چون زلیخا مردهٔ او و او شاعر طبع قفا نبک من ذکری حبیب و منزل چون همه زنان او را به جان می‌جستند ای عجب غزل او و نالهٔ او بهر چه بود مگر دانست کی این‌ها همه تمثال صورتی‌اند کی بر تخته‌های خاک نقش کرده‌اند عاقبت این امرء القیس را حالی پیدا شد کی نیم‌شب از ملک و فرزند گریخت و خود را در دلقی پنهان کرد و از آن اقلیم به اقلیم دیگر رفت در طلب آن کس کی از اقلیم منزه است یختص برحمته من یشاء الی آخرهअम्रुलक़ैस की कहानी जो अरब का बादशाह था और सूरत से बहुत खूबसूरत था, अपने वक्त का यूसुफ़ था, और अरब की औरतें ज़ुलेखा की तरह उसकी दीवानी थीं, और वह 'क़िफा नबकी मन ज़िकरा हबीब व मंज़िल' के अंदाज़ में शायर था, जब सभी औरतें उसे जान से चाहती थीं, अजब बात है कि उसकी गज़ल और उसका रोना किस लिए था? शायद वह जानता था कि ये सब मिट्टी की तख्तियों पर नक़्श की गई मूर्तियों की मिसाल हैं, अंततः इस अम्रुलक़ैस को एक ऐसी हालत हुई कि आधी रात को वह अपनी सल्तनत और औलाद छोड़कर भागा और खुद को एक कंबल में छुपाकर उस देश से दूसरे देश चला गया, उस शख्स की तलाश में जो पवित्र देश से है: "यख़्तस्सु बिरह़मतिही मन यशाउ" (वह जिसे चाहे अपनी रहमत के लिए चुन लेता है), आदि 68 शेर
  116. 116 بخش ۱۱۶ - بعد مکث ایشان متواری در بلاد چین در شهر تختگاه و بعد دراز شدن صبر بی‌صبر شدن آن بزرگین کی من رفتم الوداع خود را بر شاه عرضه کنم اما قدمی تنیلنی مقصودی او القی راسی کفادی ثم یا پای رساندم به مقصود و مراد یا سر بنهم هم‌چو دل از دست آن‌جا و نصیحت برادران او را سود ناداشتن یا عاذل العاشقین دع فة اضلها الله کیف ترشدها الی آخرهचीन के शहरों में छिपकर रहने के बाद और धीरज के बाद, बड़े भाई का बेताब हो जाना कि “मैं चला, अलविदा! मैं खुद को राजा के सामने पेश करता हूँ, चाहे मेरा कदम मुझे मेरे मक़सद तक पहुँचाए या मैं अपना सर रख दूँ जैसे दिल उसके हाथों से,” और उसके भाइयों की नसीहत का उसे कोई फायदा न होना: “ऐ आशिकों को नसीहत करने वाले, उस फ़ितने को छोड़ दे जिसे अल्लाह ने गुमराह कर दिया, तू उसे कैसे हिदायत देगा,” आदि 120 शेर
  117. 117 بخش ۱۱۷ - بیان مجاهد کی دست از مجاهده باز ندارد اگر چه داند بسطت عطاء حق را کی آن مقصود از طرف دیگر و به سبب نوع عمل دیگر بدو رساند کی در وهم او نبوده باشد او همه وهم و اومید درین طریق معین بسته باشد حلقهٔ همین در می‌زند بوک حق تعالی آن روزی را از در دیگر بدو رساند کی او آن تدبیر نکرده باشد و یرزقه من حیث لا یحتسب العبد یدبر والله یقدر و بود کی بنده را وهم بندگی بود کی مرا از غیر این در برساند اگر چه من حلقهٔ این در می‌زنم حق تعالی او را هم ازین در روزی رساند فی‌الجمله این همه درهای یکی سرایست مع تقریرهमुजाहिद का बयान कि वह मुजाहिदत से हाथ नहीं खींचता, भले ही वह अल्लाह की अता की व्यापकता जानता हो, कि वह मक़सूद दूसरी तरफ़ से और किसी और तरह के काम के कारण उसे मिलेगा जो उसकी कल्पना में नहीं था। वह सारी कल्पना और उम्मीद इसी खास तरीके पर रखता है, इसी दरवाज़े की कुंडी खटखटाता है, शायद अल्लाह उसे उस दिन वो रोज़ी दे जो उसने सोची भी न हो, "और उसे ऐसी जगह से रोज़ी देता है जहाँ से वह उम्मीद भी नहीं करता। बंदा तदबीर करता है और अल्लाह तक़दीर करता है। और ऐसा भी हो सकता है कि बंदे को बंदगी का वहम हो कि मुझे इस दरवाज़े के अलावा से देगा, हालाँकि मैं इसी दरवाज़े की कुंडी खटखटा रहा हूँ, अल्लाह उसे इसी दरवाज़े से रोज़ी देता है। संक्षेप में, ये सब एक ही घर के दरवाज़े हैं," उसके बयान के साथ 31 शेर
  118. 118 بخش ۱۱۸ - حکایت آن شخص کی خواب دید کی آنچ می‌طلبی از یسار به مصر وفا شود آنجا گنجیست در فلان محله در فلان خانه چون به مصر آمد کسی گفت من خواب دیده‌ام کی گنجیست به بغداد در فلان محله در فلان خانه نام محله و خانهٔ این شخص بگفت آن شخص فهم کرد کی آن گنج در مصر گفتن جهت آن بود کی مرا یقین کنند کی در غیر خانهٔ خود نمی‌باید جستن ولیکن این گنج یقین و محقق جز در مصر حاصل نشودउस व्यक्ति की कहानी जिसने सपना देखा कि जो कुछ तुम बाईं ओर से तलाश कर रहे हो, वह मिस्र में मिलेगा, वहाँ फलां मोहल्ले में फलां घर में एक ख़ज़ाना है। जब वह मिस्र आया तो किसी ने कहा: मैंने सपना देखा है कि बग़दाद में फलां मोहल्ले में फलां घर में एक ख़ज़ाना है। उसने उस व्यक्ति के मोहल्ले और घर का नाम बताया। उस व्यक्ति ने समझा कि मिस्र में ख़ज़ाना बताने का मकसद यह था कि मुझे यकीन हो जाए कि मुझे अपने घर के अलावा कहीं तलाश नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह निश्चित और वास्तविक ख़ज़ाना मिस्र के अलावा कहीं नहीं मिलेगा 11 शेर
  119. 119 بخش ۱۱۹ - سبب تاخیر اجابت دعای مؤمنमोमिन की दुआ की क़ुबूलियत में देरी का कारण 21 शेर
  120. 120 بخش ۱۲۰ - رجوع کردن به قصهٔ آن شخص کی به او گنج نشان دادند به مصر و بیان تضرع او از درویشی به حضرت حقउस व्यक्ति की कहानी पर लौटना जिसे मिस्र में ख़ज़ाना दिखाया गया था, और उसकी दरिद्रता से अल्लाह के हुज़ूर में उसकी विनती का बयान 17 शेर
  121. 121 بخش ۱۲۱ - رسیدن آن شخص به مصر و شب بیرون آمدن به کوی از بهر شبکوکی و گدایی و گرفتن عسس او را و مراد او حاصل شدن از عسس بعد از خوردن زخم بسیار و عَسی أَنْ تَکْرَهوا شَیْئاً وَ هُوَ خَیْرٌ لَکُمْ و قوله تعالی سَیَجْعَلُ اللهُ بَعْدَ عُسْرٍ یُسْراً و قوله علیه‌السلام اشتدّی ازمّة تنفرجی و جمیع القرآن و الکتب المنزلة فی تقریر هذاउस व्यक्ति का मिस्र पहुँचना और रात को गलियों में भीख मांगने के लिए निकलना, और सिपाही द्वारा उसे पकड़ लिया जाना, और कई चोटें खाने के बाद सिपाही से उसकी मुराद पूरी होना, और "और हो सकता है कि तुम किसी चीज़ को नापसंद करो और वह तुम्हारे लिए बेहतर हो," और अल्लाह ताला का फरमान: "अल्लाह जल्द ही मुश्किल के बाद आसानी पैदा करेगा," और पैगंबर अलैहिस्सलाम का फरमान: "ऐ संकट, तेज़ हो ताकि खुल जाए," और समस्त क़ुरान और अवतरित पुस्तकें इसी की तक़रीर में हैं 19 शेर
  122. 122 بخش ۱۲۲ - بیان این خبر کی الکذب ریبة والصدق طمانینةइस खबर का बयान कि "झूठ शंका है और सच इत्मीनान है" 57 शेर
  123. 123 بخش ۱۲۳ - مثلउदाहरण 5 शेर
  124. 124 بخش ۱۲۴ - بازگشتن آن شخص شادمان و مراد یافته و خدای را شکر گویان و سجده کنان و حیران در غرایب اشارات حق و ظهور تاویلات آن در وجهی کی هیچ عقلی و فهمی بدانجا نرسدउस व्यक्ति का खुशी-खुशी और मुराद हासिल करके वापस लौटना, और अल्लाह का शुक्र अदा करना और सजदा करना, और अल्लाह के इशारों की अजीबोगरीब बातों में हैरान होना और उनकी तावीलों का ऐसे तरीक़े से ज़ाहिर होना जहाँ कोई अक्ल और समझ नहीं पहुँच सकती 49 शेर
  125. 125 بخش ۱۲۵ - مکرر کردن برادران پند دادن بزرگین را و تاب ناآوردن او آن پند را و در رمیدن او ازیشان شیدا و بی‌خود رفتن و خود را در بارگاه پادشاه انداختن بی‌دستوری خواستن لیک از فرط عشق و محبت نه از گستاخی و لاابالی الی آخرهभाइयों का बड़े को बार-बार नसीहत करना और उसका वह नसीहत न सुन पाना, और उनका उससे बेताब होकर और बेसुध होकर भागना, और खुद को बादशाह के दरबार में बिना इजाज़त के फेंक देना, लेकिन अत्यधिक प्रेम और मोहब्बत के कारण, न कि गुस्ताखी और लापरवाह से, आदि 63 शेर
  126. 126 بخش ۱۲۶ - مفتون شدن قاضی بر زن جوحی و در صندوق ماندن و نایب قاضی صندوق را خریدن باز سال دوم آمدن زن جوحی بر امید بازی پارینه و گفتن قاضی کی مرا آزاد کن و کسی دیگر را بجوی الی آخر القصهक़ाज़ी का जुही की पत्नी पर मोहित होना और संदूक में फंस जाना, और क़ाज़ी के नायब का संदूक खरीद लेना, फिर दूसरे साल जुही की पत्नी का पिछली चाल की उम्मीद में आना, और क़ाज़ी का कहना कि मुझे आज़ाद कर दो और किसी और को ढूँढो, आदि कहानी 26 शेर
  127. 127 بخش ۱۲۷ - رفتن قاضی به خانهٔ زن جوحی و حلقه زدن جوحی به خشم بر در و گریختن قاضی در صندوقی الی آخرهकाजी का जुही की पत्नी के घर जाना और जुही का गुस्से में दरवाज़ा खटखटाना और काजी का एक संदूक में भाग जाना, आदि 45 शेर
  128. 128 بخش ۱۲۸ - آمدن نایب قاضی میان بازار و خریداری کردن صندوق را از جوحی الی آخرهकाज़ी के नायब का बाज़ार में आना और जुही से संदूक खरीदना, आदि 18 शेर
  129. 129 بخش ۱۲۹ - در تفسیر این خبر کی مصطفی صلوات‌الله علیه فرمود من کنت مولاه فعلی مولاه تا منافقان طعنه زدند کی بس نبودش کی ما مطیعی و چاکری نمودیم او را چاکری کودکی خلم آلودمان هم می‌فرماید الی آخرهइस हदीस की तफ़सीर में कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "जिसका मैं मौला हूँ, अली भी उसका मौला है," तो मुनाफिकों ने ताना मारा कि क्या इतना ही काफी नहीं था कि हमने उसकी आज्ञाकारिता और सेवा की, वह हमें एक गंदे बच्चे की सेवा करने का भी हुक्म दे रहा है, आदि 15 शेर
  130. 130 بخش ۱۳۰ - باز آمدن زن جوحی به محکمهٔ قاضی سال دوم بر امید وظیفهٔ پارسال و شناختن قاضی او را الی اتمامهजुही की पत्नी का दूसरे साल पिछली वज़ीफ़े की उम्मीद में काज़ी की अदालत में वापस आना, और काज़ी का उसे पहचानना, आदि 36 शेर
  131. 131 بخش ۱۳۱ - باز آمدن به شرح قصهٔ شاه‌زاده و ملازمت او در حضرت شاهशाहज़ादे की कहानी के बयान पर लौटना और बादशाह के दरबार में उसकी सेवा 19 शेर
  132. 132 بخش ۱۳۲ - در بیان آنک دوزخ گوید کی قنطرهٔ صراط بر سر اوست ای مؤمن از صراط زودتر بگذر زود بشتاب تا عظمت نور تو آتش ما را نکشد جز یا مؤمن فان نورک اطفاء ناریइस बयान में कि जहन्नम कहती है कि 'पुल-ए-सिरात' उस पर है, ऐ मोमिन! 'सिरात' से जल्दी गुज़र, जल्दी कर ताकि तेरे नूर की अज़मत हमारी आग को न बुझा दे, सिवाय "ऐ मोमिन! तेरा नूर मेरी आग को बुझा देगा" 26 शेर
  133. 133 بخش ۱۳۳ - متوفی شدن بزرگین از شه‌زادگان و آمدن برادر میانین به جنازهٔ برادر کی آن کوچکین صاحب‌فراش بود از رنجوری و نواختن پادشاه میانین را تا او هم لنگ احسان شد ماند پیش پادشاه صد هزار از غنایم غیبی و غنی بدو رسید از دولت و نظر آن شاه مع تقریر بعضهशाहजादों में से बड़े का देहांत होना और बीच वाले भाई का भाई के जनाज़े में आना, कि वह छोटा वाला बीमारी के कारण बिस्तर पर था, और बादशाह का बीच वाले को नवाज़ना यहाँ तक कि वह भी एहसानमंद हो गया और बादशाह के सामने ही रहा, उसे गैबी ग़नीमतों से सौ हज़ार और उस बादशाह की दौलत और नज़र से दौलतमंद हो गया, उसके कुछ बयान के साथ 125 शेर
  134. 134 بخش ۱۳۴ - وسوسه‌ای کی پادشاه‌زاده را پیدا شد از سبب استغنایی و کشفی کی از شاه دل او را حاصل شده بود و قصد ناشکری و سرکشی می‌کرد شاه را از راه الهام و سر شاه را خبر شد دلش درد کرد روح او را زخمی زد چنانک صورت شاه را خبر نبود الی آخرهएक वस्वसा जो शाहज़ादे को हुआ, इस वजह से कि उसे बादशाह से जो बेनियाज़ी और कशफ़ हासिल हुआ था, वह बादशाह के साथ नाशुक्रिया और सरकशी का इरादा कर रहा था, बादशाह को इल्हाम और दिल के ज़रिये इसकी खबर हो गई, उसका दिल दुखने लगा, उसकी रूह को एक ज़ख़्म लगा, हालाँकि बादशाह की शक्ल को खबर नहीं थी, आदि 38 शेर
  135. 135 بخش ۱۳۵ - خطاب حق تعالی به عزرائیل علیه‌السلام کی ترا رحم بر کی بیشتر آمد ازین خلایق کی جانشان قبض کردی و جواب دادن عزرائیل حضرت راअल्लाह ताला का अज़राइल अलैहिस्सलाम से ख़िताब कि तुम्हें इन मखलूक में से किस पर सबसे ज़्यादा रहम आया जिनकी जान तुमने कब्ज़ की, और अज़राइल का अल्लाह को जवाब देना 18 शेर
  136. 136 بخش ۱۳۶ - کرامات شیخ شیبان راعی قدس الله روحه العزیزशेख़ शयबान राई (क़ुद्दिसल्लाहु रूहहुल अज़ीज़) की करामतें 16 शेर
  137. 137 بخش ۱۳۷ - رجوع کردن به قصهٔ پروردن حق تعالی نمرود را بی‌واسطهٔ مادر و دایه در طفلیअल्लाह ताला का बचपन में निमरूद को माँ और दाई के बिना पालने की कहानी पर लौटना 34 शेर
  138. 138 بخش ۱۳۸ - رجوع کردن بدان قصه کی شاه‌زاده بدان طغیان زخم خورد از خاطر شاه پیش از استکمال فضایل دیگر از دنیا برفتउस कहानी पर लौटना कि शाहज़ादे को उस सरकशी के कारण बादशाह के दिल से ज़ख़्म लगा और दूसरे फज़ाइल पूरे होने से पहले ही दुनिया से चला गया 12 शेर
  139. 139 بخش ۱۳۹ - وصیت کردن آن شخص کی بعد از من او برد مال مرا از سه فرزند من کی کاهل‌ترستउस व्यक्ति की वसीयत कि मेरे बाद मेरे तीन बच्चों में से जो सबसे सुस्त है, वह मेरा माल लेगा 25 शेर
  140. 140 بخش ۱۴۰ - مثلउदाहरण 14 शेर