مثنوی
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Раздел 154
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M5:3629
این سخن از حد و اندازهست بیش ای ایاز اکنون بگو احوال خویش
M5:3630
هست احوال تو از کان نوی تو بدین احوال کی راضی شوی
M5:3631
هین حکایت کن از آن احوال خوش خاک بر احوال و درس پنج و شش
M5:3632
حال باطن گر نمیآید بگفت حال ظاهر گویمت در طاق وجفت
M5:3633
که ز لطف یار تلخیهای مات گشت بر جان خوشتر از شکرنبات
M5:3634
زان نبات ار گرد در دریا رود تلخی دریا همه شیرین شود
M5:3635
صدهزار احوال آمد همچنین باز سوی غیب رفتند ای امین
M5:3636
حال هر روزی بدی مانند نی همچو جو اندر روش کش بند نی
M5:3637
شادی هر روز از نوعی دگر فکرت هر روز را دیگر اثر
назад بخش ۱۵۳ - تفسیر این آیت که وَ إِنَّ الدّارَ الآخِرةَ لَهیَ الحَیَوانُ لَوْ کانوا یَعْلَمونَ کی در و دیوار و عرصهٔ آن عالم و آب و کوزه و میوه و درخت همه زندهاند و سخنگوی و سخنشنو و جهت آن فرمود مصطفی علیه السلام کی الدُّنیا جیفةٌ وَ طُلّابُها کلابٌ و اگر آخرت را حیات نبودی آخرت هم جیفه بودی جیفه را برای مردگیش جیفه گویند نه برای بوی زشت و فرخجی Толкование аята: «И поистине, обитель Последней жизни — это жизнь, если бы они знали» (29:64) — что стены и земля того мира, и вода, и кувшин, и плоды, и деревья — всё живо, говорит и слышит; и потому Пророк сказал: «Мир — это падаль, а его искатели — собаки». И если бы в Последней жизни не было жизни, она тоже была бы падалью. Падаль называют падалью из-за её мертвенности, а не из-за дурного запаха и нечистоты
далее بخش ۱۵۵ - تمثیل تن آدمی به مهمانخانه و اندیشههای مختلف به مهمانان مختلف عارف در رضا بدان اندیشههای غم و شادی چون شخص مهماندوست غریبنواز خلیلوار کی در خلیل باکرام ضیف پیوسته باز بود بر کافر و مؤمن و امین و خاین و با همه مهمانان روی تازه داشتی Уподобление человеческого тела гостинице, а различных мыслей — различным гостям. Гностик в своём принятии мыслей о печали и радости подобен гостеприимному путнику, подобному Халилу, чья дверь всегда была открыта для гостей — неверных и верных, честных и предателей, и он ко всем гостям относился радушно